स्पेशल स्टोरी

वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग बैठकें अधिकारी और जनता के बीच संवाद में बन रही हैं बाधा

*डॉ देवेंद्र कुमार शर्मा*

Panchayat 24 : प्रौद्योगिकी का उद्देश्य शासन को अधिक संवेदनशील, सरल और प्रभावी बनाना है; यदि वही नागरिक और प्रशासन के बीच दीवार बनने लगे तो आत्ममंथन अनिवार्य हो जाता है। आज सरकारी कार्यालयों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (वीसी) का बढ़ता वर्चस्व इसी प्रश्न को जन्म देता है कि कहीं साधन ही साध्य से अधिक महत्वपूर्ण तो नहीं हो गया?

यह निर्विवाद है कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग ने समय, धन और संसाधनों की बचत की है। दूर-दराज़ बैठे अधिकारियों को एक मंच पर लाने, त्वरित समीक्षा करने और निर्णय प्रक्रिया को गति देने में इसकी भूमिका महत्त्वपूर्ण है। किंतु हर उपयोगिता की भी एक मर्यादा होती है। जब घंटों चलने वाली वीसी सुबह से देर रात तक अधिकारियों को स्क्रीन के सामने बाँधे रखती है, तब उसके बाहर खड़ा नागरिक स्वयं से पूछता है—क्या उसकी समस्या किसी बैठक के एजेंडे से भी कम महत्वपूर्ण है?

ऐसे दृश्य अब असामान्य नहीं रहे। अधिकारी का कक्ष बंद है, बाहर फरियादियों की लंबी कतार है और भीतर स्क्रीन पर बैठक चल रही है। कई बार अधिकारी नागरिक से यह कहकर क्षमा मांगता है कि “वीसी समाप्त होते ही आपकी बात सुनूँगा”, किंतु बैठक समाप्त होने का समय स्वयं बैठक को भी ज्ञात नहीं होता। सुबह से आशा लेकर आया व्यक्ति शाम तक प्रतीक्षा में थक जाता है। उसकी पीड़ा केवल समय की नहीं, व्यवस्था से टूटते विश्वास की होती है।

लोकतांत्रिक शासन की आत्मा जनता से संवाद है। अधिकारी का प्रथम दायित्व अपने उच्चाधिकारी के प्रति नहीं, बल्कि संविधान की उस भावना के प्रति है जो नागरिक को त्वरित, सुलभ और संवेदनशील प्रशासन का अधिकार देती है। यदि तकनीक इस संवाद को बाधित करने लगे तो उसका पुनर्मूल्यांकन आवश्यक है।

प्रश्न वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का विरोध नहीं, बल्कि उसके विवेकपूर्ण उपयोग का है। क्या एक दिन में बैठकों की संख्या निर्धारित नहीं होनी चाहिए? क्या उनकी अधिकतम समय-सीमा तय नहीं होनी चाहिए? क्या जनसुनवाई के समय को पूर्णतः वीसी-मुक्त नहीं रखा जाना चाहिए? और सबसे बड़ा प्रश्न—क्या किसी नागरिक की समस्या से अधिक महत्वपूर्ण कोई बैठक हो सकती है?

व्यवस्था तब जीवंत होती है जब अधिकारी फाइलों से अधिक लोगों के बीच दिखाई देता है। किसी समस्या का वास्तविक समाधान वातानुकूलित कक्ष में बैठकर नहीं, बल्कि धरातल की वास्तविकताओं को देखकर निकलता है। अत्यधिक आभासी प्रशासन कहीं न कहीं निर्णयों को भी आभासी बना देता है।

ऐसे समय में दूरदर्शन के लोकप्रिय व्यंग्यकार जसपाल भट्टी का फ्लॉप शो अनायास स्मरण हो आता है, जहाँ उनका प्रसिद्ध संवाद था—”बधाई हो, आज बैठक में तय हो गया कि अगली बैठक कब होगी।” तीन दशक पहले कहा गया यह व्यंग्य आज डिजिटल युग में और अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है। अंतर केवल इतना है कि तब बैठकें कमरों में होती थीं, आज स्क्रीन पर होती हैं; किंतु यदि परिणाम वही रहे तो तकनीक की उपलब्धि भी व्यंग्य का विषय बन जाती है।

सुशासन का मूल मंत्र स्पष्ट है—तकनीक नागरिक तक पहुँचने का पुल बने, नागरिक और प्रशासन के बीच की दीवार नहीं। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग आवश्यक है, पर उसकी सीमा भी आवश्यक है। क्योंकि अंततः किसी भी लोककल्याणकारी राज्य की सबसे बड़ी “लाइव मीटिंग” वह होती है, जिसमें अधिकारी और नागरिक आमने-सामने बैठकर विश्वास का संवाद करते हैं। वही संवाद लोकतंत्र की सबसे प्रभावी कॉन्फ्रेंस है, और वही किसी भी शासन की वास्तविक सफलता का मापदंड।

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