दादरी विधानसभा

दादरी की हर बड़ी राजनीतिक रैली पर क्यों लग जाता है विवाद का ग्रहण?भाजपा की ताजा रैली ने फिर जगाए पुराने सवाल, क्या गुटबाजी चुनावी रणनीति पर पड़ेगी भारी? रैली के बाद किस दिशा में जाएगी गौतम बुद्ध नगर की राजनीति?

डॉ देवेंद्र कुमार शर्मा

Panchayat 24 (दादरी)। कभी गौतमबुद्ध नगर की राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा दादरी समय के साथ आर्थिक दृष्टि से भले ही नोएडा और ग्रेटर नोएडा जैसे आधुनिक शहरों के सामने पीछे छूट गया हो, लेकिन राजनीतिक दृष्टि से आज भी इसकी प्रासंगिकता बरकरार है। जिले की राजनीति की दिशा और दशा तय करने वाले अनेक महत्वपूर्ण घटनाक्रम आज भी दादरी की धरती से ही आकार लेते हैं। यही कारण है कि किसी भी बड़े राजनीतिक दल के लिए दादरी केवल एक विधानसभा क्षेत्र नहीं, बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीतिक नब्ज माना जाता है।

विडंबना यह है कि पिछले एक दशक में दादरी की पहचान केवल राजनीतिक गतिविधियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि यहां आयोजित होने वाली लगभग हर बड़ी राजनीतिक रैली किसी न किसी विवाद से भी जुड़ती चली गई। जहां सामान्यतः किसी बड़े नेता का आगमन किसी शहर के लिए उत्सव और राजनीतिक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है, वहीं दादरी में बड़ी रैलियों से पहले विवाद, आरोप-प्रत्यारोप और संगठनात्मक खींचतान जैसे घटनाक्रम लगभग परंपरा बनते दिखाई देते हैं।

इसकी शुरुआत मिहिर भोज प्रकरण के दौरान हुई राजनीतिक उथल-पुथल से जोड़कर देखी जाती है। उस समय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रस्तावित सभा भी व्यापक राजनीतिक विवादों के केंद्र में रही। इसके बाद समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की मिहिर भोज डिग्री कॉलेज में आयोजित रैली भी विभिन्न कारणों से लगातार चर्चा और विवाद का विषय बनी रही। अब इसी श्रृंखला में भाजपा की दादरी स्थित आर.वी. नॉर्थलैंड कॉलेज में आयोजित होने वाली रैली भी आयोजन से पहले ही राजनीतिक चर्चाओं और अंदरूनी खींचतान के कारण सुर्खियों में आ गई है।

यह रैली मूल रूप से 1 अगस्त को प्रस्तावित थी, लेकिन बाद में इसे स्थगित कर 3 अगस्त को आयोजित करने का निर्णय लिया गया। आधिकारिक तौर पर इसके पीछे लखनऊ में पार्टी की महत्वपूर्ण बैठक को कारण बताया गया, किंतु राजनीतिक गलियारों में इसे भाजपा की स्थानीय गुटबाजी से जोड़कर देखा जा रहा है। संगठन के भीतर चल रही खींचतान को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं लगातार सामने आती रही हैं।

दरअसल, गौतमबुद्ध नगर भाजपा की दो दशक पुरानी गुटबाजी समय-समय पर सामने आती रही है। सामान्य परिस्थितियों में यह मतभेद भले ही सतह के नीचे दिखाई देते हों, लेकिन जैसे ही कोई बड़ा राजनीतिक आयोजन सामने आता है, यह अंतर्विरोध रुपी ज्वालामुखी अचानक फूट पस्त है। इस बार भी ठीक रैली से पहले यही स्थिति बनती दिखाई दी।

इस रैली का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि उत्तर प्रदेश भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी तथा पश्चिम उत्तर प्रदेश के नव नियुक्त क्षेत्रीय अध्यक्ष नवाब सिंह नागर का सार्वजनिक रूप से एक साथ गौतमबुद्ध नगर आगमन हो रहा है। आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारियों के बीच इस कार्यक्रम को संगठनात्मक शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा जा रहा है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि रैली के मुख्य आयोजक और दादरी ब्लॉक प्रमुख बिजेंद्र प्रमुख स्वयं भविष्य में दादरी विधानसभा सीट से अपनी दावेदारी मजबूत करने का प्रयास कर रहे हैं। वहीं पूरे आयोजन के पीछे भाजपा के राज्यसभा सांसद सुरेंद्र सिंह नागर की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जा रही है। ऐसे में कार्यक्रम केवल संगठनात्मक सभा न होकर भविष्य की राजनीतिक संभावनाओं का भी संकेत माना जा रहा है।

सूत्रों के अनुसार विवाद का प्रमुख कारण जिले के भाजपा संगठन के एक प्रभावशाली धड़े की कथित उपेक्षा को माना जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में चल रही चर्चाओं ने इस आयोजन को सामान्य राजनीतिक कार्यक्रम से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। पार्टी के भीतर जहां एक वर्ग इस रैली को ऐतिहासिक बनाने में पूरी ताकत झोंकता दिखाई दे रहा है, वहीं दूसरे वर्ग की अपेक्षाकृत उदासीनता भी राजनीतिक संदेश दे रही है।

फिलहाल आयोजन की लगभग सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। संभावित बारिश को देखते हुए विशाल वाटरप्रूफ पंडाल तैयार किया गया है और बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी के दावे किए जा रहे हैं। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि यह रैली केवल भीड़ के लिहाज से सफल साबित होती है या संगठनात्मक एकजुटता का भी प्रभावी संदेश देने में कामयाब रहती है।

रैली की वास्तविक तस्वीर तो इसके संपन्न होने के बाद ही सामने आएगी, लेकिन इतना स्पष्ट है कि दादरी की यह राजनीतिक सभा केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश, विशेषकर गौतमबुद्ध नगर की भाजपा राजनीति की आंतरिक स्थिति, संगठनात्मक संतुलन और आगामी विधानसभा चुनावों की रणनीति का महत्वपूर्ण संकेतक साबित होगी। यदि पार्टी इस मंच से एकजुटता का संदेश देने में सफल रहती है तो यह आगामी चुनावी तैयारियों के लिए सकारात्मक संकेत होगा, लेकिन यदि गुटबाजी की चर्चाएं ही केंद्र में बनी रहीं तो इसका राजनीतिक प्रभाव दूरगामी भी हो सकता है।

दादरी का राजनीतिक इतिहास यही बताता है कि यहां होने वाली रैलियां अक्सर केवल भाषणों तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि वे आने वाले राजनीतिक समीकरणों की भूमिका भी लिखती हैं। इसलिए इस बार की रैली पर केवल गौतमबुद्ध नगर ही नहीं, बल्कि पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीतिक निगाहें टिकी हुई हैं।

Related Articles

Back to top button