दादरी विधानसभा

श्रीचंद शर्मा प्रकरण में असली परीक्षा किसकी—उम्मीदवार की, दल की या खबर लिखने वाली कलम की?

Panchayat 24 : चुनाव के ठीक पहले किसी उम्मीदवार की शैक्षणिक योग्यता, व्यक्तिगत पृष्ठभूमि और राजनीतिक यात्रा को लेकर सवाल उठना अपने आप में असामान्य नहीं है। लोकतंत्र में सार्वजनिक जीवन से जुड़े व्यक्ति के रिकॉर्ड की पड़ताल पत्रकारिता का अधिकार भी है और दायित्व भी।

लेकिन पत्रकारिता का पहला धर्म केवल सवाल उठाना नहीं, सवाल को प्रमाण की कसौटी पर कसना है।

मेरठ-सहारनपुर शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा द्वारा वर्तमान विधान परिषद सदस्य श्रीचंद शर्मा को पुनः प्रत्याशी बनाए जाने के बाद प्रकाशित एक रिपोर्ट ने उनकी शैक्षणिक योग्यता, 2021 के चुनावी शपथपत्र में दर्ज ‘साहित्य रत्न’ उपाधि, पारिवारिक पृष्ठभूमि और सामाजिक पहचान तक को सवालों के घेरे में रखा है।

रिपोर्ट को पढ़ते हुए पहला प्रश्न श्रीचंद शर्मा के पक्ष या विपक्ष का नहीं उठता। पहला प्रश्न पत्रकारिता का उठता है—क्या प्रकाशित आरोपों और स्थापित तथ्यों के बीच पर्याप्त अंतर रखा गया है?

और दूसरा— क्या जिस योग्यता को लेकर सवाल खड़ा किया गया है, उसका उस चुनाव की कानूनी पात्रता से वास्तव में कोई संबंध भी है?

यहीं से पूरी बहस का स्वरूप बदल जाता है।

सबसे पहले कानून को पढ़िए, फिर उम्मीदवार को

मेरठ-सहारनपुर सीट शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र है। भारत निर्वाचन आयोग के अनुसार शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में शामिल होने के लिए संबंधित व्यक्ति का निर्धारित अवधि में कम-से-कम तीन वर्ष तक मान्य शिक्षण संस्थान में अध्यापन से जुड़ा होना आवश्यक है। यह शर्त मतदाता की पात्रता से संबंधित है।इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि संविधान के अनुच्छेद 171(3)(c) में वर्णित तीन वर्ष की शिक्षण-शर्त शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के मतदाताओं पर लागू होती है, उम्मीदवार पर नहीं। दूसरे शब्दों में, केवल इस आधार पर कि किसी उम्मीदवार के पास कोई सामान्य स्नातक डिग्री नहीं है, उसे शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिए स्वतः अयोग्य नहीं कहा जा सकता।

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि संविधान के अनुच्छेद 171(3)(c) में वर्णित तीन वर्ष की शिक्षण-शर्त शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के मतदाताओं पर लागू होती है, उम्मीदवार पर नहीं। दूसरे शब्दों में, केवल इस आधार पर कि किसी उम्मीदवार के पास कोई सामान्य स्नातक डिग्री नहीं है, उसे शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिए स्वतः अयोग्य नहीं कहा जा सकता। राज्य विधानमंडल की सदस्यता के सामान्य संवैधानिक प्रावधान अनुच्छेद 173 में नागरिकता, आयु और संसद द्वारा निर्धारित अन्य योग्यताओं का उल्लेख करते हैं।

इसलिए किसी रिपोर्ट में यह संकेत देना कि किसी विशेष शैक्षणिक उपाधि को स्नातक के बराबर न मानने से शिक्षक एमएलसी बनने की पात्रता ही संदिग्ध हो जाती है, अपने आप में अधूरी कानूनी तस्वीर प्रस्तुत करना होगा।

यहां एक बुनियादी पत्रकारिता सिद्धांत लागू होता है—

जिस कानून को आधार बनाकर आरोप लगाया जा रहा है, पहले उसी कानून को पूरा पढ़ना चाहिए।

‘साहित्य रत्न’ पर सवाल हो सकते हैं, लेकिन निष्कर्ष प्रमाण से निकलेगा

हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग की विभिन्न परीक्षाओं और उपाधियों की मान्यता का इतिहास सरल नहीं रहा है। केंद्रीय हिंदी निदेशालय की वर्तमान वेबसाइट बताती है कि ‘प्रथमा’ परीक्षा को एक विशेष सरकारी अधिसूचना के तहत मैट्रिक के समकक्ष मान्यता 26 नवंबर 2010 तक दी गई थी। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि हिंदी साहित्य सम्मेलन से संबंधित अलग-अलग परीक्षाओं और अलग-अलग समय की मान्यताओं को एक ही रंग में नहीं देखा जा सकता।

आयकर अपीलीय अधिकरण के एक मामले में भी हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा संचालित विभिन्न पाठ्यक्रमों की मान्यता और उसके ऐतिहासिक दावों पर विस्तार से चर्चा हुई है। उसी न्यायिक रिकॉर्ड में संस्था द्वारा ‘साहित्य रत्न’ को बीए (ऑनर्स हिंदी) के समकक्ष बताए जाने का दावा दर्ज है, साथ ही पूर्व में दी गई कुछ मान्यताओं के समाप्त हो जाने संबंधी सरकारी/न्यायिक संदर्भ भी सामने आते हैं।

अर्थात वास्तविक पत्रकारिता का रास्ता क्या होना चाहिए?

यह नहीं कि—“यह फर्जी डिग्री है।” बल्कि यह कि—“1987 में प्राप्त इस विशेष ‘साहित्य रत्न’ उपाधि की उस समय और वर्तमान में वैधानिक/शैक्षणिक स्थिति क्या है?” दोनों वाक्यों में जमीन-आसमान का अंतर है। पहला वाक्य फैसला सुना देता है। दूसरा दस्तावेज मांगता है। पत्रकारिता का काम फैसला सुनाना नहीं, तथ्य सामने रखना है।

‘फर्जी डिग्री’ कहना और मान्यता पर सवाल उठाना एक बात नहीं

किसी शैक्षणिक प्रमाणपत्र को ‘फर्जी’ कहने के लिए केवल यह पर्याप्त नहीं कि आज वह किसी सरकारी नौकरी में मान्य नहीं है।

फर्जी का अर्थ प्रमाणपत्र के अस्तित्व, जारी होने की प्रामाणिकता अथवा उसमें कथित कूटरचना से जुड़ सकता है; जबकि किसी उपाधि का किसी विशेष नौकरी, पद या शैक्षणिक समकक्षता के लिए मान्य न होना अलग कानूनी प्रश्न है। इस अंतर को मिटाना पत्रकारिता को आरोपपत्र में बदल सकता है।

यदि श्रीचंद शर्मा के पास वास्तव में 1987 का प्रमाणपत्र है, तो मूल प्रमाणपत्र सामने आना चाहिए। उसके बाद यह देखना चाहिए कि उस समय कौन-सा सरकारी आदेश लागू था, उस आदेश की सीमा क्या थी और उस उपाधि को किस प्रयोजन के लिए मान्यता प्राप्त थी। यही तथ्यात्मक रास्ता है।

सबसे महत्वपूर्ण—क्या यह योग्यता एमएलसी बनने की अनिवार्य शर्त है?

यहीं मूल रिपोर्ट की सबसे बड़ी तार्किक परीक्षा होती है। यदि शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से एमएलसी बनने के लिए उम्मीदवार के पास स्नातक डिग्री होना ही आवश्यक नहीं है, तो केवल स्नातक समकक्षता के विवाद को लेकर उसके विधान परिषद चुनाव लड़ने की पात्रता पर प्रश्नचिह्न लगाना कितना उचित है?

यह सवाल खबर लिखने वाले से पूछा जाना चाहिए।

निर्वाचन आयोग स्वयं शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के मतदाता के लिए तीन वर्ष के अध्यापन की शर्त बताता है। एक न्यायिक निर्णय इससे आगे जाकर स्पष्ट करता है कि शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के लिए तीन वर्ष की शिक्षण-योग्यता मतदाता की संवैधानिक पात्रता है, उम्मीदवार की अनिवार्य शैक्षणिक योग्यता नहीं।

इसलिए यदि श्रीचंद शर्मा के चुनावी शपथपत्र में ‘साहित्य रत्न’ दर्ज है तो उसकी सत्यता, प्रकृति और मान्यता की पड़ताल करना उचित हो सकता है; लेकिन उससे सीधे यह निष्कर्ष निकालना कि “इसलिए उनका एमएलसी चुनाव लड़ना ही अवैध है”, उपलब्ध कानूनी ढांचे से स्वतः सिद्ध नहीं होता।

गरीबी खबर हो सकती है, हथियार नहीं

मीडिया में प्रकाशित रिपोर्ट का एक दूसरा हिस्सा और अधिक गंभीर है। किसी सार्वजनिक व्यक्ति की पारिवारिक पृष्ठभूमि का उल्लेख तभी प्रासंगिक है जब वह उसके सार्वजनिक जीवन, राजनीतिक यात्रा या किसी तथ्य की समझ में वास्तविक योगदान करता हो।

लेकिन यदि किसी व्यक्ति के पिता साइकिल की दुकान चलाते थे, परिवार आर्थिक कठिनाई में था, बहन की शादी में गांव ने सहयोग किया या किसी रिश्तेदार ने बच्चों के पालन-पोषण में सहायता की—तो इन तथ्यों को इस प्रकार प्रस्तुत करना कि पाठक के मन में व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा या योग्यता के प्रति अवमानना पैदा हो, पत्रकारिता नहीं कही जा सकती।

गरीबी किसी व्यक्ति की कमी नहीं होती।

भारत का लोकतंत्र ही इस संभावना पर टिका है कि साधारण परिवार का व्यक्ति असाधारण सार्वजनिक भूमिका तक पहुंच सकता है। राजनीति यदि केवल आर्थिक रूप से संपन्न लोगों का क्षेत्र बन जाए तो लोकतंत्र का सामाजिक आधार ही सिकुड़ जाएगा। इसलिए श्रीचंद शर्मा गरीब परिवार से आए या संपन्न परिवार से—यह अपने आप में उनके पक्ष या विपक्ष का प्रमाण नहीं है। उनके सार्वजनिक जीवन का मूल्यांकन होना चाहिए—

उनके काम से, उनके विचार से, उनके राजनीतिक आचरण से और उनके सार्वजनिक रिकॉर्ड से।

बड़ा सवाल : जाति, कर्मकांड और ‘चुटिया’—यह जानकारी क्यों?

भाजपा के शिक्षक वर्ग से विधान परिषद उम्मीदवार श्री चंद शर्मा के ऊपर लिखी गई मीडिया रिपोर्ट का वह हिस्सा और भी अधिक विचारणीय है जिसमें व्यक्ति की जातीय पहचान, धार्मिक कर्मकांड से जुड़ी भूमिका और ‘चुटिया’ जैसे संबोधन को विस्तार से स्थान दिया गया है।

यदि कोई व्यक्ति सार्वजनिक जीवन में जाति या धर्म के आधार पर कोई राजनीतिक भूमिका निभाता है, तब उसका संदर्भ प्रासंगिक हो सकता है। लेकिन किसी व्यक्ति के ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने, कर्मकांड कराने या चोटी रखने को इस तरह प्रस्तुत करना कि उससे उसके राजनीतिक मूल्यांकन पर कोई नकारात्मक संकेत निकले—पत्रकारिता की निष्पक्षता पर स्वाभाविक प्रश्न खड़ा करता है। साथ ही यह निजी जीवन और मौलिक अधिकारों पर भी कुठाराघात है।

किसी व्यक्ति की जाति उसका पत्रकारिता-संबंधी दोष नहीं हो सकती। धार्मिक पहचान तो तब तक सार्वजनिक आरोप का विषय नहीं बन सकती जब तक उसका किसी प्रमाणित सार्वजनिक तथ्य से संबंध न हो। किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान तो तब तक सार्वजनिक आरोप का विषय नहीं बन सकती जब तक उसका किसी प्रमाणित सार्वजनिक तथ्य से संबंध न हो। पत्रकारिता को व्यक्ति की पहचान का विश्लेषण करना चाहिए, उसकी पहचान को उसके विरुद्ध इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

क्या चुनाव के ठीक पहले प्रकाशित खबर अपने आप पक्षपाती हो जाती है?

नहीं। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। चुनाव के दौरान किसी उम्मीदवार की पड़ताल करना पत्रकारिता का अधिकार ही नहीं, लोकतांत्रिक आवश्यकता भी है। लेकिन चुनाव का समय पत्रकारिता की जिम्मेदारी को कम नहीं, कई गुना बढ़ा देता है।क्योंकि एक खबर का प्रभाव सामान्य दिनों की तुलना में कहीं अधिक हो सकता है। इसलिए चुनावी रिपोर्ट में तीन स्तर अलग-अलग होने चाहिए— तथ्य क्या है? आरोप क्या है?
रिपोर्टर का निष्कर्ष क्या है? जब ये तीनों एक ही भाषा में मिल जाते हैं तो समाचार और अभियान के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है। फिर सवाल उठता है क्या श्रीचंद शर्मा की आलोचना नहीं होनी चाहिए? बिल्कुल होनी चाहिए। किसी राजनीतिक व्यक्ति को आलोचना से मुक्त करना भी लोकतंत्र के विरुद्ध होगा। लेकिन श्रीचंद शर्मा के कार्यकाल की समीक्षा होनी चाहिए।

– विधान परिषद में उन्होंने कितने प्रश्न उठाए?
– शिक्षकों के कौन-कौन से मुद्दे उठाए?
– किस नीति में क्या हस्तक्षेप किया?
– उनके वादों का क्या हुआ?
– शिक्षक समुदाय में उनके प्रति समर्थन और असंतोष का अनुपात क्या है?
– उनकी राजनीतिक कार्यशैली पर विरोधियों की क्या आपत्तियां हैं?

– ये सभी वैध पत्रकारिता के विषय हैं।

– और यदि उनके चुनावी शपथपत्र में कोई तथ्य गलत पाया जाता है तो उसकी भी पड़ताल होनी चाहिए।

लेकिन समीक्षा और अभियोग में अंतर है। समीक्षा कहती है— “रिकॉर्ड देखिए और सवाल पूछिए।” अभियोग कहता है पहले निष्कर्ष तय करती है और फिर उसके समर्थन में सामग्री तलाशती है।

क्या भाजपा ने जांच की या नहीं? इसका उत्तर भाजपा से ही मांगना चाहिए

मीडिया रिपोर्ट का एक उचित सवाल यह है कि उम्मीदवार घोषित करते समय राजनीतिक दल ने उम्मीदवार के दस्तावेजों की जांच किस स्तर तक की। यह सवाल पूछा जाना चाहिए।लेकिन इसका पत्रकारिता-सम्मत तरीका भी स्पष्ट है—भाजपा से लिखित प्रतिक्रिया मांगिए। श्रीचंद शर्मा से मूल प्रमाणपत्र और उनका पक्ष मांगिए। निर्वाचन अधिकारी से पूछिए कि नामांकन के समय कौन-कौन से दस्तावेज स्वीकार किए गए।संबंधित सरकारी विभाग से पूछिए कि 1987 में उस उपाधि की स्थिति क्या थी। और यदि किसी न्यायालय का फैसला इस मामले पर लागू होता है तो उसका मूल आदेश प्रकाशित कीजिए। फिर पाठक को तय करने दीजिए कि सही क्या है।वास्तव में यही दस्तावेज बनाम दस्तावेज वाली पत्रकारिता है।

राजनीतिक उपयोगिता भी तथ्य है, लेकिन प्रमाण चाहिए

श्रीचंद शर्मा को भाजपा ने 2026 के शिक्षक विधान परिषद चुनाव के लिए पुनः प्रत्याशी बनाया है। उनके पुनः प्रत्याशी बनाए जाने के बाद शिक्षक संगठनों की ओर से समर्थन की खबरें भी सामने आ रही हैं। इससे इतना तो कहा जा सकता है कि उनका राजनीतिक और संगठनात्मक आधार पार्टी के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। लेकिन यह कहना कि भाजपा ने केवल किसी व्यक्ति के कहने पर आंखें बंद करके टिकट दिया, या उम्मीदवार ने स्वयं यह दावा किया कि उसके अलावा कोई जीत नहीं सकता—ऐसे कथनों के लिए प्रत्यक्ष प्रमाण आवश्यक है।पत्रकारिता में “सूत्रों के अनुसार” हर आरोप का लाइसेंस नहीं हो सकता।

एक गरीब परिवार का लड़का नेता बन सकता है—और यही लोकतंत्र की खूबसूरती है

श्रीचंद शर्मा के जीवन की संघर्ष-कथा यदि प्रमाणित रूप में सामने आती है तो उसे उनकी कमजोरी नहीं, उनके जीवन-संघर्ष के रूप में लिखा जाना चाहिए।

किसी कार्यकर्ता का लंबे समय तक संगठन में काम करना, कठिन परिस्थितियों में पार्टी के लिए समय देना, जमीन से जुड़ा रहना और धीरे-धीरे राजनीतिक पहचान बनाना—यह भारतीय राजनीति की वास्तविक सामाजिक यात्रा का हिस्सा है। यदि यह सब श्रीचंद शर्मा की राजनीतिक यात्रा का हिस्सा है तो यह उनके सार्वजनिक जीवन के संघर्ष को बयां करता है और उन्हें स्थान मिलना चाहिए। पत्रकारिता का संतुलन यही है कि सभी आरोपों को कसौटी पर परखा जाए। कोई अपने आओ में प्रमाण नहीं ही सकता। हर आरोप का न्यायधीश प्रमाण अर्थात साक्ष्य ही है।

असल सवाल श्रीचंद शर्मा नहीं, पत्रकारिता का मानदंड है

इस पूरे प्रकरण को यदि व्यक्ति-विशेष से ऊपर उठाकर देखा जाए तो असली बहस कहीं अधिक बड़ी दिखाई देती है।

– क्या चुनावी पत्रकारिता का उद्देश्य किसी उम्मीदवार को जिताना या हराना है?

नहीं।

– क्या पत्रकारिता को उम्मीदवार से कठिन प्रश्न पूछने चाहिए?

निश्चित रूप से।

– क्या उम्मीदवार को जवाब देने का समान अवसर मिलना चाहिए?

निश्चित रूप से।

– क्या निजी जीवन, जाति, गरीबी या धार्मिक पहचान को बिना स्पष्ट सार्वजनिक प्रासंगिकता के चुनावी हथियार बनाया जाना चाहिए?

नहीं।

-क्या किसी की जातीय पहचान का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से उपहास उड़ाना चाहिए?

बिलकुल भी नहीं।

– क्या शैक्षणिक योग्यता की वैधानिक स्थिति की पड़ताल होनी चाहिए?

हां।

– क्या किसी उपाधि की मान्यता और उसके आधार पर चुनाव लड़ने की पात्रता को एक ही प्रश्न मान लेना उचित है?

नहीं।

– क्या किसी रिपोर्ट में “फर्जी डिग्री” जैसे निष्कर्षात्मक शब्द प्रमाण के बिना इस्तेमाल किए जाने चाहिए?

नहीं—जब तक प्रमाण स्वयं उस निष्कर्ष को स्थापित न करें।

कलम का पक्ष केवल सत्य होना चाहिए

श्रीचंद शर्मा भाजपा के उम्मीदवार हैं—इसलिए उनके पक्ष में लिखना पत्रकारिता नहीं है। श्रीचंद शर्मा भाजपा के उम्मीदवार हैं—इसलिए उनके खिलाफ लिखना भी पत्रकारिता नहीं है।पत्रकारिता का पक्ष न भाजपा है, न विपक्ष। न उम्मीदवार है, न विरोधी।

पत्रकारिता का पक्ष दस्तावेज, तथ्य और जनहित है।

यदि श्रीचंद शर्मा की शैक्षणिक योग्यता में कोई वास्तविक विसंगति है तो वह सामने आनी चाहिए। यदि नहीं है तो आरोप भी वापस उसी अनुपात में कमजोर पड़ने चाहिए।

यदि उनके राजनीतिक काम में कमी है तो उसका विश्लेषण होना चाहिए। यदि उपलब्धियां हैं तो उनका उल्लेख भी होना चाहिए।

और यदि किसी रिपोर्ट में उनकी जाति, गरीबी, धार्मिक पहचान या व्यक्तिगत संबोधन को उनके खिलाफ वातावरण बनाने, प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष अपमानित करने या सार्वजनिक रूप स्वागत उपहास उडाने लिए इस्तेमाल किया गया है, तो उस पत्रकारिता की शैली पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

क्योंकि लोकतंत्र में उम्मीदवारों की परीक्षा जरूरी है—
लेकिन उम्मीदवारों की परीक्षा लेने वाली पत्रकारिता की परीक्षा उससे भी ज्यादा जरूरी है।

चुनाव में जनता अपना प्रतिनिधि चुनती है। मीडिया जनता को तथ्य उपलब्ध कराता है। इसलिए पत्रकारिता को यह अधिकार नहीं कि वह मतदाता की जगह फैसला कर दे। उसका काम इतना भर है—

तथ्य सामने रखिए।
दस्तावेज सामने रखिए।
दोनों पक्ष सामने रखिए।
फिर निर्णय जनता पर छोड़ दीजिए।

यही पत्रकारिता की मर्यादा है।
यही लोकतंत्र की गरिमा है।
और यही कलम की असली स्वतंत्रता भी।

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