स्पेशल स्टोरी

भक्ति की साधना या शोर का प्रदर्शन?

आस्था के नाम पर कानफोड़ू संगीत, क्या ऐसी भक्ति से भगवान प्रसन्न होंगे? कहाँ हैं कानून के रखवाले?

डॉ. देवेंद्र कुमार शर्मा

संगीत को साधना और भक्ति को ईश्वर-प्राप्ति का माध्यम माना गया है। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में संगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि आत्मा को परमात्मा से जोड़ने वाली एक पवित्र अनुभूति है। शास्त्रों और संत परंपरा में भक्ति, ध्यान और साधना के माध्यम से ईश्वर के सान्निध्य की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त किया गया है। लेकिन समय के साथ भक्ति और संगीत का जो स्वरूप बदल रहा है, क्या उसे भी उसी आध्यात्मिक श्रेणी में रखा जा सकता है?

संगीत मन को शांति देने, मानसिक तनाव कम करने और भावनाओं को संतुलित करने का सशक्त माध्यम है। किंतु आज संगीत के नाम पर डीजे से निकलने वाली तेज, कर्कश और कानफोड़ू ध्वनियों पर थिरकती युवा पीढ़ी का एक अलग ही दृश्य दिखाई देता है। जहाँ कुछ लोगों के लिए यह मौज-मस्ती का अवसर है, वहीं बीमारों, बुजुर्गों, बच्चों और ध्वनि के प्रति संवेदनशील लोगों के लिए यही संगीत असहनीय यातना बन जाता है। विशेष रूप से हृदय रोगियों और अन्य गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए अत्यधिक तेज ध्वनि परेशानी बढ़ा सकती है।

तकनीक और व्यावसायीकरण के इस दौर में भक्ति की अभिव्यक्ति भी इससे अछूती नहीं रही। अब धार्मिक यात्राओं और आयोजनों में भी डीजे का शोर भक्ति-भाव पर हावी होता दिखाई देता है। सवाल यह है कि क्या आराधना की पवित्रता को ध्वनि की तीव्रता से मापा जा सकता है? क्या ईश्वर के प्रति समर्पण जताने के लिए वातावरण को इतना कोलाहलपूर्ण बना देना आवश्यक है कि दूसरे लोगों का सुकून छिन जाए?

हर वर्ष की तरह इस बार भी नवरात्र से पूर्व भक्त दिल्ली के झंडेवाला मंदिर से अखंड ज्योत लेकर अपने गाँवों, मोहल्लों, घरों और मंदिरों की ओर लौट रहे हैं। पिछले दो दिनों से यह सिलसिला जारी है। हमारे गाँव से गुजरने वाले जीटी रोड, जिसे अब पुराना जीटी रोड कहा जाता है, से अखंड ज्योत लेकर गुजरने वाली हजारों टोलियाँ श्रद्धा और उत्साह का दृश्य प्रस्तुत करती हैं। इन टोलियों में पुरुषों के साथ महिलाएँ और बच्चे भी शामिल होते हैं।

हम बचपन से अखंड ज्योत की इन यात्राओं के साक्षी रहे हैं। कभी यह यात्रा सादगी, शालीनता और भक्ति-भाव से ओतप्रोत हुआ करती थी। श्रद्धालु माता रानी के जयकारे लगाते हुए, भजन गाते हुए और आस्था में लीन होकर आगे बढ़ते थे। लेकिन अब इस यात्रा का स्वरूप धीरे-धीरे बदलता दिखाई दे रहा है। श्रद्धा के स्थान पर प्रदर्शन और भक्ति के साथ मौज-मस्ती का शोर बढ़ता जा रहा है।

यात्राओं में बड़ी संख्या में युवा शामिल हो रहे हैं। उनके उत्साह और आस्था पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती, लेकिन जब इस उत्साह की अभिव्यक्ति कानफोड़ू डीजे और अत्यधिक तेज ध्वनि के रूप में होने लगे, तब सवाल उठना स्वाभाविक है। ध्वनि की तीव्रता बढ़ाने के लिए एम्प्लीफायर और भारी बेस 00वाले साउंड सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है। इससे निकलने वाली तीव्र ध्वनि आसपास के लोगों के लिए असहनीय हो जाती है। सड़क से गुजरने वाले वाहन चालकों और यात्रियों को भी परेशानी होती है। कई बार कंपन के कारण आसपास की नालियों का गंदा पानी और कीचड़ तक उछलने लगता है।

मामला धर्म और आस्था से जुड़ा होने के कारण स्थानीय लोग तमाम परेशानियों के बावजूद अक्सर चुप रहना ही उचित समझते हैं। उन्हें आशंका रहती है कि कहीं उनकी शिकायत को धार्मिक भावनाओं के विरोध के रूप में न देखा जाने लगे। लेकिन क्या धार्मिक आस्था के प्रति सम्मान का अर्थ यह है कि आम नागरिक अपने घर में भी शांति से रहने का अधिकार खो दे?

बीती रात का अनुभव इस समस्या की गंभीरता को समझने के लिए पर्याप्त है।

रात के लगभग 11:30 बजे थे। यह आमतौर पर गहरी नींद का समय होता है। मैं भी अपने परिवार के साथ सो रहा था। मेरा मकान सड़क के किनारे स्थित है। अचानक बिस्तर हिलने लगा। दरवाजे और खिड़कियाँ किसी अदृश्य शक्ति के प्रभाव में काँपने लगे। इसके साथ ही झनझनाहट की तेज आवाज सुनाई देने लगी, जो लगातार बढ़ती जा रही थी। दीवारों, फर्श और छत में तीव्र कंपन महसूस हो रहा था।

घर के सभी लोगों की नींद खुल गई। बच्चे भयभीत हो उठे। दूसरी मंजिल पर, यानी पहली मंजिल की छत पर पैर रखते ही, कंपन पैरों से होता हुआ शरीर तक महसूस हो रहा था। एक पल के लिए ऐसा लगा मानो कोई मकान की नींव पर लगातार प्रहार कर उसे गिराने की कोशिश कर रहा हो, या फिर धरती पर तेज भूकंप आ गया हो।

घनी आबादी वाले क्षेत्र में ध्वनि का ऐसा प्रभाव और भी भयावह हो जाता है। लगभग 20 मिनट तक यही स्थिति बनी रही। यह केवल शोर नहीं था, बल्कि घर के भीतर तक महसूस होने वाला तीव्र कंपन था, जिसने परिवार की नींद और मन की शांति छीन ली।

जरा सोचिए, यदि किसी स्वस्थ व्यक्ति और उसके परिवार की यह स्थिति हो सकती है, तो बीमारों, बुजुर्गों और हृदय रोगियों पर इसका क्या असर पड़ता होगा? ऐसे लोगों के लिए बीते दो दिन किसी बुरे सपने से कम नहीं रहे होंगे। वे न तो घर से बाहर निकलकर इस शोर से बच सकते हैं और न ही घर के भीतर चैन से रह सकते हैं। उनके लिए अपना ही घर, जो सुरक्षा और सुकून का आश्रय होना चाहिए, असहायता का कारण बन जाता है।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल कानून के पालन को लेकर है। सामान्य परिस्थितियों में रात 10 बजे के बाद लाउडस्पीकर और ध्वनि-विस्तारक यंत्रों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध संबंधी नियम लागू होते हैं। ऐसे में रात लगभग 11:30 बजे तक इतनी तेज आवाज में डीजे बजने पर निगरानी और कार्रवाई करने वाले जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठना लाजिमी है। धार्मिक आयोजन होने का अर्थ यह नहीं कि ध्वनि प्रदूषण से संबंधित नियमों की अनदेखी की जाए। आस्था का सम्मान और कानून का पालन एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक सभ्य समाज की अनिवार्य शर्तें हैं।

लेकिन इस पूरे प्रसंग का प्रश्न केवल कानून तक सीमित नहीं है। इससे कहीं बड़ा प्रश्न हमारी धार्मिक चेतना और भक्ति की समझ से जुड़ा है। क्या भक्ति का अर्थ अपनी उपस्थिति का शोरगुलपूर्ण प्रदर्शन करना है? क्या श्रद्धा की गहराई डीजे की आवाज और बेस की तीव्रता से तय होगी? क्या माता रानी अपने भक्तों से ऐसी अभिव्यक्ति की अपेक्षा करती हैं, जिससे दूसरे लोगों को कष्ट पहुँचे?

भक्ति का मूल भाव समर्पण, करुणा, संयम और लोकमंगल है। यदि हमारी आराधना किसी बीमार की पीड़ा बढ़ा दे, किसी बच्चे की नींद छीन ले, किसी बुजुर्ग को बेचैन कर दे और किसी परिवार को भयभीत कर दे, तो हमें अपनी भक्ति के स्वरूप पर आत्ममंथन अवश्य करना चाहिए। ईश्वर की आराधना में किसी दूसरे के कष्ट की अनदेखी कैसे उचित ठहराई जा सकती है?

धार्मिक यात्राओं में उत्साह हो, जयकारे हों, भजन हों और सामूहिक उल्लास भी हो—लेकिन यह सब मर्यादा और संवेदनशीलता के दायरे में रहे। भक्ति की गरिमा बनाए रखने के लिए डीजे की ध्वनि सीमित करना, निर्धारित समय का पालन करना और स्थानीय निवासियों की सुविधा का ध्यान रखना आवश्यक है। आयोजकों, श्रद्धालुओं और प्रशासन—सभी को इस दिशा में अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।

माता रानी के प्रति सच्ची श्रद्धा केवल उनके जयकारे लगाने में नहीं, बल्कि उनके प्रति समर्पण को अपने आचरण में उतारने में है। दूसरों की पीड़ा को समझना और उनके सुख-चैन का सम्मान करना भी धर्म का ही हिस्सा है।

आखिर, हमें यह तय करना होगा कि हम भक्ति कर रहे हैं या भक्ति का प्रदर्शन। क्योंकि ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग शोर से नहीं, श्रद्धा से प्रशस्त होता है।

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