स्पेशल स्टोरी

विश्वास की कीमत और व्यवस्था के बीच समन्वय का आभाव!

डॉ देवेंद्र कुमार शर्मा

Panchayat 24 : क्या शिक्षित समाज में इस बात पर विचार की गुंजाइश होनी चाहिए कि रिश्तों में विश्वास की भूमिका क्या होती है? परिवार, समाज, सरकार और संपूर्ण व्यवस्था का आधार यह विश्वास ही है। यहाँ तक कि एक अपराधी भी कानूनसम्मत पुलिस कार्रवाई और न्यायालय द्वारा दी गई सजा को इस विश्वास के चलते स्वीकार कर लेता है कि जिस कानून के तहत उसे सजा दी गई है, उस कानून को उसने समाज का हिस्सा होने के नाते स्वीकार किया था।

हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा गौतम बुद्ध नगर में हुए श्रमिक आंदोलन के दौरान छात्रा और एक्टिविस्ट आकृति चौधरी पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका/NSA) के तहत की गई कार्रवाई पर दिए गए फैसले ने भी गौतम बुद्ध नगर में व्यवस्था के विभिन्न अंगों के बीच विश्वास के सवाल को उजागर किया है।

न्यायालय ने दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति चौधरी पर लगाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका/NSA) को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया है। कड़ी टिप्पणी करते हुए न्यायालय ने कहा कि नौकरशाही का “तानाशाही” रवैया उत्तर प्रदेश को “ओरवेलियन डिस्टोपिया” में बदल सकता है। ओरवेलियन डिस्टोपिया से आशय ऐसे दमनकारी और भयावह समाज से है, जहाँ सरकार या सत्ता में बैठे लोग आम जनता के जीवन, विचारों और स्वतंत्रता पर पूरी तरह नियंत्रण रखते हैं।

न्यायालय ने साथ ही पाँच लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है, जिसकी वसूली गौतम बुद्ध नगर की तत्कालीन जिलाधिकारी तथा जिम्मेदार अधिकारियों और पुलिसकर्मियों के वेतन से की जाएगी।

अदालत के निर्णय का सम्मान है। फिर भी एक बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि लोककल्याणकारी राज्य में नौकरशाही की भूमिका निर्णायक होती है। यह भी नहीं नकारा जा सकता कि नोएडा में हुए श्रमिक आंदोलन के दौरान हिंसा और आगजनी हुई थी। यदि पुलिस और प्रशासन ने समय रहते उचित कार्रवाई नहीं की होती, तो हालात और खराब हो सकते थे। पुलिस ने भी मीडिया के सामने जो बातें रखी थीं, उनसे यह संकेत मिल रहा था कि पूरा घटनाक्रम किसी साजिश का परिणाम हो सकता है।

पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह और जिलाधिकारी मेधा रूपम मैदान में डटी रहीं और हालात को सामान्य किया। हिंसा में शामिल लोगों के खिलाफ मामले दर्ज हुए और वे न्यायालय तक पहुँचे। राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत कार्रवाई की भी संस्तुति की गई।

यहाँ एक बात महत्वपूर्ण है कि NSA के तहत कार्रवाई की प्रक्रिया पुलिस से शुरू होकर राज्यपाल तक जाती है, जिसमें जिलाधिकारी भी एक अहम कड़ी होती हैं। हालांकि, कार्रवाई का आधार वही होता है, जिसे पुलिस द्वारा तैयार किया जाता है।

मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने जहाँ NSA के तहत की गई कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए उसे रद्द किया है, वहीं पुलिस और जिलाधिकारी पर जुर्माने का भी आदेश दिया है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब NSA के तहत कार्रवाई को जिलाधिकारी द्वारा स्वीकृति देना उनके विवेकाधिकार का विषय है, तो क्या जिलाधिकारी ने पुलिस द्वारा तैयार किए गए आधार पर किसी भरोसे के चलते अपनी सहमति दी थी?

यह मानना भी स्वाभाविक है कि जिलाधिकारी ने पुलिस द्वारा एकत्र किए गए साक्ष्यों को देखा और उनका अध्ययन किया होगा। यानी उन साक्ष्यों में उन्हें पर्याप्त दम दिखाई दिया होगा, जिसके आधार पर उन्होंने भरोसा करते हुए अपनी सहमति प्रदान की होगी।

लेकिन अब सवाल यह उठता है कि यदि पुलिस के पास वास्तव में इतने प्रबल साक्ष्य थे, तो क्या न्यायालय के समक्ष उन्हें प्रस्तुत करने में पुलिस से कोई चूक हुई? या फिर पुलिस द्वारा तैयार किए गए साक्ष्यों और न्यायालय में उनकी कानूनी स्वीकार्यता के बीच कहीं कोई ऐसी खामी रह गई, जिसने पूरी कार्रवाई को कमजोर कर दिया?

कुछ भी हो, पूरे प्रकरण में जिलाधिकारी को इस विश्वास की कीमत निजी नुकसान के रूप में चुकानी पड़ी है।

बहरहाल, इस पूरे मामले ने गौतम बुद्ध नगर की व्यवस्था में पुलिस कमिश्नरेट और जिला प्रशासन के बीच समन्वय के अभाव को लेकर समय-समय पर उठने वाली चर्चाओं को एक बार फिर हवा दे दी है। गौतम बुद्ध नगर में पहले से ही प्राधिकरण और जिला प्रशासन के बीच अधिकार क्षेत्र को लेकर खींचतान की चर्चाएँ होती रही हैं। जिले में कमिश्नरेट व्यवस्था लागू होने के बाद कानून-व्यवस्था से संबंधित मजिस्ट्रियल शक्तियों के सीमित हो जाने से जिला प्रशासन के अधिकार क्षेत्र में भी बदलाव आया है।

ऐसे में यह प्रकरण केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई के सही या गलत होने का सवाल नहीं है। यह उससे बड़ा सवाल खड़ा करता है—व्यवस्था के विभिन्न अंगों के बीच विश्वास कितना है, उस विश्वास की बुनियाद कितनी मजबूत है और यदि किसी एक अंग का निर्णय दूसरे अंग के भरोसे पर आधारित है, तो उस निर्णय की अंतिम जिम्मेदारी किसकी होगी?

लोकतांत्रिक व्यवस्था में अधिकारों का विभाजन जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है उनके बीच विश्वास, संवाद और जवाबदेही का संतुलन। क्योंकि व्यवस्था केवल कानूनों से नहीं चलती; वह एक-दूसरे पर किए गए संस्थागत विश्वास से भी चलती है। और जब यह विश्वास टूटता है, तो सवाल केवल किसी एक अधिकारी या संस्था पर नहीं उठता—पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता कठघरे में खड़ी हो जाती है।

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