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कलाधाम की त्रासदी और आरडब्ल्यूए की नैतिक जिम्मेदारी : जब श्रेय सबका तो जवाबदेही किसकी?

डॉ देवेंद्र कुमार शर्मा

Panchayat 24 : किसी भी सभ्य समाज की पहचान केवल उसकी ऊँची इमारतों, चौड़ी सड़कों और आधुनिक सुविधाओं से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वहाँ अधिकार और उत्तरदायित्व का संतुलन कितना मजबूत है। लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक मूल सिद्धांत है—”जहाँ अधिकार है, वहाँ उत्तरदायित्व भी होना चाहिए।” यदि कोई संस्था उपलब्धियों का श्रेय लेने में सबसे आगे खड़ी हो, तो विफलताओं और दुर्घटनाओं के समय वह स्वयं को दर्शक घोषित नहीं कर सकती।

ग्रेटर नोएडा के नॉलेज पार्क-2 स्थित कलाधाम हाउसिंग सोसाइटी में छह वर्षीय मासूम अव्यान की बोरिंग के लिए खोदे गए गड्ढे में गिरकर हुई दर्दनाक मृत्यु केवल एक प्रशासनिक लापरवाही का मामला नहीं है। यह उस सामूहिक उत्तरदायित्व की भी परीक्षा है, जिसकी चर्चा अक्सर विकास कार्यों के समय बड़े उत्साह से की जाती है। इस दुर्घटना ने एक असहज प्रश्न समाज के सामने रख दिया है—क्या आरडब्ल्यूए (RWA) केवल उपलब्धियों का श्रेय लेने के लिए है, या फिर संकट और दुर्घटनाओं के समय उसकी भी कोई नैतिक जवाबदेही बनती है?

इस घटना में प्रथम दृष्टया सबसे बड़ी जिम्मेदारी निश्चित रूप से ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण की बनती है। यदि प्राधिकरण के आदेश पर बोरवेल का कार्य कराया जा रहा था, तो कार्यस्थल की सुरक्षा, बैरिकेडिंग, चेतावनी संकेत और सतत निगरानी उसकी कानूनी जिम्मेदारी थी। इन दायित्वों के निर्वहन में गंभीर चूक हुई। यही कारण है कि प्राधिकरण के मुख्य कार्यपालक अधिकारी ने संबंधित एजेंसी से लेकर पर्यवेक्षण करने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों तक के विरुद्ध कार्रवाई की। यह स्वीकारोक्ति इस बात का प्रमाण है कि प्रशासनिक तंत्र अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह इनकार नहीं कर सकता।

किन्तु प्रश्न यहीं समाप्त नहीं होता।

हर सेक्टर और प्रत्येक हाउसिंग सोसाइटी में आरडब्ल्यूए स्वयं को निवासियों का प्रतिनिधि बताती है। पानी की समस्या हो, बिजली का मुद्दा हो, सुरक्षा का प्रश्न हो, पार्कों का विकास हो या सड़क की मरम्मत—हर उपलब्धि के साथ आरडब्ल्यूए की सक्रियता का उल्लेख अवश्य किया जाता है। कई बार विकास कार्यों का श्रेय लेने की होड़ इतनी तीव्र हो जाती है कि एक ही कार्य के लिए अनेक दावेदार सामने आ जाते हैं। ऐसे में यह स्वाभाविक प्रश्न है कि यदि सफलता सामूहिक श्रेय का विषय है, तो असफलता केवल प्रशासन की जिम्मेदारी कैसे हो सकती है?

बताया गया कि जिस स्थान पर बोरिंग खोदा गया, वह मूल योजना के अनुसार सोसाइटी के बाहर ग्रीन बेल्ट में होना था। यदि वास्तव में ऐसा था और भारी-भरकम मशीन सोसाइटी के भीतर प्रवेश कर गई, पार्किंग स्थल तक पहुँची, गहरा गड्ढा खोद दिया और कई घंटों तक कार्य चलता रहा, तो क्या यह संभव है कि पूरी आरडब्ल्यूए को इसकी भनक तक न लगी हो?

यदि आरडब्ल्यूए यह कहती है कि उसे इसकी जानकारी ही नहीं थी, तो यह स्वयं उसके दावों पर प्रश्नचिह्न है। और यदि जानकारी थी, तो यह और भी गंभीर स्थिति है कि उसने सुरक्षा मानकों के पालन को सुनिश्चित कराने की कोई पहल नहीं की।

कहावत है—“घर का मुखिया सो जाए, तो चौखट जागकर भी घर नहीं बचा सकती।” यही स्थिति यहाँ दिखाई देती है। आरडब्ल्यूए कानूनी रूप से प्राधिकरण नहीं है, लेकिन सामाजिक रूप से वह सोसाइटी की सामूहिक चेतना का प्रतिनिधित्व करती है। उसकी भूमिका केवल ज्ञापन देना, चुनाव लड़ना या सोशल मीडिया पर सक्रिय रहना नहीं हो सकती। उसका सबसे बड़ा दायित्व अपने निवासियों के हितों और सुरक्षा पर सतत निगरानी रखना है।

यह भी सत्य है कि आरडब्ल्यूए को प्राधिकरण जैसी वैधानिक शक्तियाँ प्राप्त नहीं हैं। वह किसी निर्माण कार्य को रोकने का कानूनी अधिकार शायद न रखती हो, लेकिन वह प्रश्न तो पूछ सकती थी—यह कार्य किस अनुमति से हो रहा है? सुरक्षा प्रबंध कहाँ हैं? बैरिकेडिंग क्यों नहीं है? बच्चों की आवाजाही वाले क्षेत्र में खुले गड्ढे को बिना सुरक्षा के क्यों छोड़ा गया?

कई बार दुर्घटनाएँ केवल इसलिए नहीं होतीं कि किसी ने गलती की, बल्कि इसलिए भी होती हैं कि आसपास मौजूद लोगों ने समय रहते प्रश्न पूछने का साहस नहीं किया।

भारतीय लोकजीवन में एक प्रसिद्ध कहावत है—”बाड़ ही खेत खाने लगे, तो रखवाली कौन करेगा?” यदि सोसाइटी की सुरक्षा का दावा करने वाली संस्था अपने ही परिसर में चल रहे जोखिमपूर्ण कार्य से अनभिज्ञ रहे, तो यह स्थिति चिंताजनक है।

हमारा उद्देश्य किसी संस्था को कठघरे में खड़ा करना नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व की संस्कृति पर गंभीर विमर्श करना है। प्रशासनिक जवाबदेही अनिवार्य है और इस मामले में वह स्पष्ट रूप से बनती है। परंतु सामाजिक संस्थाओं की नैतिक जिम्मेदारी भी उतनी ही आवश्यक है। लोकतंत्र केवल अधिकारों का उत्सव नहीं, बल्कि दायित्वों का अनुशासन भी है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि आरडब्ल्यूए स्वयं भी इस घटना की स्वतंत्र समीक्षा करे। यदि कहीं चूक हुई है, तो उसे स्वीकार करे। आत्ममंथन किसी संस्था को छोटा नहीं बनाता; बल्कि उसकी विश्वसनीयता बढ़ाता है। दुनिया की प्रतिष्ठित संस्थाएँ अपनी गलतियों को स्वीकार करके ही अधिक मजबूत बनी हैं।

कलाधाम की यह घटना केवल एक मासूम की मृत्यु नहीं, बल्कि शहरी नागरिक व्यवस्था के लिए एक चेतावनी है। यदि इससे भी हम यह नहीं सीख पाए कि सुरक्षा सामूहिक जिम्मेदारी है, तो भविष्य में ऐसी घटनाएँ फिर दोहराई जा सकती हैं।

अंततः यही कहा जा सकता है कि श्रेय और जवाबदेही एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। यदि कोई संस्था विकास कार्यों की सफलता का श्रेय लेने में आगे रहती है, तो उसे विफलताओं और दुर्घटनाओं के समय भी नैतिक रूप से आगे आकर आत्ममंथन करना चाहिए।

क्योंकि इतिहास केवल यह नहीं लिखता कि किसने उपलब्धियों का दावा किया था; इतिहास यह भी दर्ज करता है कि संकट की घड़ी में किसने अपनी जिम्मेदारी स्वीकार की थी।

यदि किसी समाज की संस्थाएँ अपने आसपास घट रही संभावित पीड़ा को समय रहते रोकने का प्रयास नहीं करतीं, तो केवल कानूनी दायित्व से मुक्त हो जाना पर्याप्त नहीं होता। समाज अंततः नैतिक उत्तरदायित्व का भी लेखा-जोखा रखता है।

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