नोएडा में श्रमिक आंदोलन बेकाबू: सड़कों पर हिंसा और आगजनी के बीच साजिश के संकेत

Panchayat 24 (नोएडा): नोएडा में वेतन वृद्धि की मांग को लेकर पिछले तीन दिनों से जारी श्रमिकों का आंदोलन सोमवार को अचानक उग्र हो गया। सुबह होते ही फेस-2 सहित विभिन्न औद्योगिक सेक्टरों में बड़ी संख्या में श्रमिक सड़कों पर उतर आए, जिससे शहर की यातायात व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई। हालात को काबू में रखने के लिए भारी संख्या में पुलिस बल, पीएसी, पैरामिलिट्री फोर्स, राजपत्रित अधिकारी और थाना प्रभारी तैनात किए गए। साथ ही पड़ोसी जिलों की पुलिस को भी अलर्ट मोड पर रखा गया।
दिनभर चले इस उग्र प्रदर्शन में करीब 40 से 50 हजार लोगों की भीड़ जुटी, जिसने कई स्थानों पर वाहनों में आगजनी की और जमकर पथराव किया। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच कई बार तीखी झड़पें हुईं, जिसके बाद हालात काबू में करने के लिए पुलिस को आंसू गैस का सहारा लेना पड़ा। प्रदर्शन के दौरान शहर के कई हिस्सों में हिंसा और अराजकता का खुला प्रदर्शन देखने को मिला। फैक्ट्रियों और अन्य संस्थानों को भारी नुकसान पहुंचाया गया, जबकि एक कार शोरूम को भी आग के हवाले कर दिया गया। इस दौरान पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह और जिलाधिकारी मेधा रूपम अपनी टीम के साथ लगातार मोर्चे पर डटी रहीं।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। उत्तर प्रदेश की आर्थिक राजधानी और दिल्ली-एनसीआर के महत्वपूर्ण औद्योगिक जिले गौतम बुद्ध नगर में हुई यह हिंसा क्या केवल वेतन वृद्धि की मांग तक सीमित है या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश छिपी है? आखिर कौन है, जिसने श्रमिकों की भावनाओं को भड़काकर इस आंदोलन को हिंसक रूप देने की कोशिश की? देश की संसद में गृहमंत्री अमित शाह द्वारा देश को नक्सली मुक्त किए जाने के बयान के बाद नोएडा में घटी यह घटना महज संयोग है या कोई प्रयोग है?
सूत्रों के मुताबिक, पुलिस की शुरुआती जांच में अर्बन नक्सलियों की सक्रियता के संकेत मिले हैं। इन सब में ऐसे लोगों की सक्रियता सामने आई है जो कथित रूप से श्रमिक नहीं थे, बल्कि भीड़ को उकसाने और हिंसा फैलाने में शामिल थे। प्रारंभिक जांच में यह भी सामने आया है कि ऐसे कुछ तत्व देश के अन्य राज्यों में हुए उग्र प्रदर्शनों में भी सक्रिय रह चुके हैं।
सोशल मीडिया पर भी अफवाहों का जाल बिछाया गया। नोएडा हिंसा के दौरान पुलिस फायरिंग में 14 लोगों की मौत की झूठी खबर फैलाने वाले दो ट्विटर हैंडल्स के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक राजीव कृष्ण के अनुसार, लगभग 50 संदिग्ध बॉट हैंडल्स की पहचान की गई है, जिन्हें महज 24 घंटे के भीतर तैयार किया गया था और जिनका इस्तेमाल सुनियोजित तरीके से भ्रामक खबरें फैलाने में किया गया।
यह पूरा घटनाक्रम एक संगठित षड्यंत्र की ओर इशारा करता है। यूपी एसटीएफ इन सभी सोशल मीडिया हैंडल्स की डिजिटल ट्रेल की गहन जांच कर रही है। एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, क्यूआर कोड के माध्यम से लोगों को व्हाट्सएप ग्रुप से जोड़ा गया, जहां से अफवाहें और भ्रामक सूचनाएं फैलाई जा रही थीं। जांच में सत्ता विरोधी दल के एक राजनीतिक व्यक्ति के ट्विटर हैंडल से भी ऐसी भ्रामक खबरें फैलाई जाने की भी बात सामने आ रही है।
पुलिस ने अब तक विभिन्न थानों में सात मामले दर्ज करते हुए हिंसा और आगजनी में शामिल करीब 200 लोगों को हिरासत में लिया है। यह घटना कुछ हद तक पूर्व में हुए दिल्ली में किसान आंदोलन के दौरान भड़की हिंसा की याद दिलाती है। प्रदर्शनकारियों द्वारा पुलिस को उकसाने की कोशिश की गई थी। हालांकि, पुलिस और प्रशासन ने संयम और सतर्कता के साथ हालात को संभालते हुए किसी भी बड़ी चूक से बचने का प्रयास किया।
फिलहाल पुलिस पूरे मामले के पीछे छिपे चेहरों तक पहुंचने के लिए लगातार जांच में जुटी है। पुलिस महानिदेशक राजीव कृष्ण ने स्पष्ट किया है कि सभी पक्षों से संवाद स्थापित कर शांतिपूर्ण समाधान निकालने के प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि कोई व्यक्ति अराजकता, हिंसा, आगजनी या षड्यंत्र में लिप्त पाया जाता है, तो उसके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। साथ ही आम जनता से अपील की गई है कि वे किसी भी प्रकार की अफवाह या भ्रामक खबरों पर ध्यान न दें।
फिलहाल स्थिति नियंत्रण में बताई जा रही है, लेकिन इस घटना ने औद्योगिक शहर नोएडा की कानून-व्यवस्था और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।



