जेवर विधानसभादादरी विधानसभा

दादरी की समाजवादी समता भाईचारा रैली में में अखिलेश यादव ने लोगों को अपना संदेश देने में कितने कामयाब रहे? जेवर की जनसभा और दादरी की रैली में कौन किस पर पड़ा भारी और क्यों? अखिलेश की रैली का गौतम बुद्ध नगर और पश्चिम उत्तर प्रदेश में होगा बदलाव?

How successful was Akhilesh Yadav in conveying his message to the people at the 'Samajwadi Samta Bhai-chara' (Socialist Equality and Brotherhood) rally in Dadri? Who managed to outshine whom—and why—at the public meeting in Jewar versus the rally in Dadri? Will Akhilesh's rally bring about a shift in Gautam Buddha Nagar and Western Uttar Pradesh?

Panchayat 24 (दादरी विधानसभा) : समाजवादी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की बहुप्रतिक्षित दादरी रैली रविवार को संपन्न हो गई। इस रैली की दिशा, दशा और परिणाम के ऊपर मैं 2 दिन पूर्व अपनी खबर जेवर से दादरी तक सियासी शंखनाद: उद्घाटन बनाम रैली के बीच 2027 की बिसात बिछी में विस्तार से चर्चा कर चुका हूं। रैली के बाद खबर में कही गई बातें लगभग सटीक उतरी ही हैं। 

दादरी रैली में अखिलेश यादव ने हालांकि साल 2027 में सपा की सरकार बनने के बाद गौतम बुद्ध नगर के किसानों को जमीन का बाजार दर मुआवजा, अतिरिक्त 64.7 प्रतिशत मुआवजा और विकसित भूखंड जल्द से जल्द दिए जाने की बात कही। उन्होंने जिले में समाप्त हुई पंचायतीराज व्यवस्था लागू करने की भी बात कही। अखिलेश यादव ने अवैध कॉलोनीयों को नियमित कर उनमें सुनियोजित विकास की बात कर जिले में बड़ी संख्या में रह रहे बाहरी लोगों को साधने का प्रयास किया। इसके अतिरिक्त महिलाओं के लिए सम्मान समृद्धि योजना के तहत 40 हजार रूपये हर महीने दिए जाने की बात कहकर आधी आबादी और सरकार द्वारा जिन लोगों पर झूठे मुकदममें लगाए है, उन सभी से मुक़दमें वापस लिए जाने की बात कहकर सरकार के विरोधियों और आलू किसानों से आलू की खरीद किए जाने की बात कहकर किसानों को साधने का प्रयास करते हुए अपना एजेंडा लोगों के बीच रखा।

उन्होंने अपनी पूर्व की सरकार में गौतम बुद्ध नगर में कराए गए कामों का जिक्र करते हुए नोएडा अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट का श्रेय लेने का भी प्रयास किया। मिहिर भोज प्रकरण का जिक्र करते हुए गुर्जर समाज की सहानभूति प्राप्त करने का प्रयास किया। इस बीच अभी तक 80-20 वाली नई सोशल इंजीनियरिंग अर्थात पीडीए की बात करने वाले अखिलेश यादव आज 95-5 पर पहुँच गए।


इसके बावजूद वह स्पष्ट तौर पर अपने विकास का मॉडल जनता के सामने रखने से चूक गए । उनके भाषण का अधिकांश हिस्सा रटा रटाया अधिक लगा। अखिलेश यादव के लगभग 50 मिनट के भाषण में एक दिन पूर्व जेवर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नोएडा अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के उद्घाटन की छाया दिखाई दी। उनका भाषण हवाई अड्डे के उद्घाटन से शुरू हुआ और उसी पर आकर समाप्त हुआ। इस दौरान उन्होंने भाजपा द्वारा महिमामंडित किए जाने वाले विकास की लाइन से बड़ी लाइन खींचने की अपेक्षा भाजपा और उसकी नीतियों की जमकर आलोचना करते हुए उस लाइन को मिटाने का ही प्रयास अधिक किया।

जिस तरह से अखिलेश यादव के भाषण में प्रधानमंत्री की जेवर जनसभा का बार-बार जिक्र किया गया उससे प्रतीत हुआ कि वह इसे सामने रखकर दादरी रैली को देख रहे है। जब वह कह रहे थे कि जेवर कि रैली सरकारी रैली थी। वहाँ लोग आए नहीं थे लाए गए थे, जबकि दादरी रैली किसान और नौजवानों की रैली है। मानो कैसे वह स्वीकार कर चुके थे कि प्रधानमंत्री की जनसभा बड़ी और विशाल थी और अपने समर्थकों और कार्यकर्ताओं के मनोबल को बनाए रखने के लिए कह रहे थे कि दोनों की कोई तुलना नहीं है।

यदि दोनों आयोजनों में उपस्थित भीड़ के आधार पर तुलना करें तो प्रधानमंत्री की जनसभा में बड़े क्षेत्रफल पर 66 ब्लॉक वाला विशालकाय तम्बू लगा था। दो तम्बू आसपास लगे थे जिसमें एक से सवा लाख लोगों के बैठने की व्यवस्था थी। जबकि दादरी की रैली मिहिर भोज डिग्री कॉलेज के सीमित प्रांगण में हुई। यहां लगभग दस हजार लोगों के बैठने की व्यवस्था थी। अधिक लोगों के पहुंचने के कारण यह व्यवस्था अपूर्ण दिखाई दी। जिसके चलते बड़ी संख्या में लोग तम्बू के अंदर और बाहर खडे थे।

जेवर जनसभा स्थल पर पहुंचने के लिए आधा दर्जन मार्ग नियत थे। बड़ी बड़ी 15 पार्किंग बनाई गई थी। ट्रैफिक जाम की कोई समस्या नहीं थी। वहीं अखिले यादव की रैली में पहुंचने के लिए पूरब में चिठेहरा गांव की ओर से और पश्चिम में धूम मानिकपुर और रेलवे रोड से होते हुए ही पहुंचा जा सकता था। वाहन पार्किंग के लिए कोई समुचित व्यवस्था नहीं थी। जिसके चलते रैली में आए लोगों को काफ़ी समस्याओं का सामना करना पड़ा।

जेवर जनसभा में 14 विधानसभाओं से लोग पहुंचे। जबकि दादरी रैली में पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लोग आए थे। लगभग दो सप्ताह पूरा घोषित प्रधानमंत्री की जेवर जनसभा के लिए भाजपा के सभी जनप्रतिनिधियों, नेताओं और पार्टी संगठन के पदाधिकारियों ने भीड़ जुटाने के प्रयास किए। हालांकि यह बात भी सही है कि इस रैली में बड़ी संख्या में स्कूल, कालेजों, और औद्योगिक संस्थाओं के लोग भी शामिल हुए। यह एक जनसभा के साथ सरकारी कार्यक्रम भी था, जिसके चलते सरकारी अमला भी इसमें शामिल रहा। हालांकि यह सभा पूरी तरह राजनीतिक रंग में रंगी दिखी । दादरी में सपा की रैली विशुद्ध राजनीतिक चुनावी रैली थी। राजकुमार भाटी ने लगभग आठ महीने पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भ्रमण कर पार्टी कार्यकर्ताओं को इसके लिए जागरूक किया जबकि जिले में पार्टी एवं संगठन के कार्यकर्ताओं ने लोगों के बीच जाकर जन सम्पर्क किया।

प्रधानमंत्री की जनसभा सर्वसमाज के लिए थी जबकि अखिलेश यादव की रैली को भले ही समाजवादी समानता भाईचारा रैली नाम दिया गया लेकिन यह पार्टी की नई सोशल इंजिनियरिंग अर्थात पीडीए के जातीय समीकरण के समाज को साधने वाली, विशेष रूप से गुर्जर समाज की रैली थी। इसके बावजूद प्रधानमंत्री की जनसभा में भारी तादात में गुर्जर समाज के लोग शामिल हुए जिनकी संख्या दादरी रैली में शामिल हुए गुर्जर समाज के लोगों से लगभग दो से ढाई गुना होने का अनुमान है।

जहां जेवर जनसभा में 1.25 से 1.50 लाख लोगों के पहुँचने का अनुमान है। वहीं, दादरी रैली में 15 हजार से 20 हजार लोगों के पहुँचने का अनुमान है। हालांकि दादरी रैली में बड़ी संख्या में जिले से बाहर के गुर्जर समाज के लोग शामिल हुए। इसके पीछे रैली से दो दिन पूर्व दादरी नगरपालिका अध्यक्ष गीता पंडित को लेकर दिए गए राजकुमार भाटी के बयान को बड़ा कारण माना जा रहा है। राजकुमार भाटी के बयान को गुर्जर समाज में लोगों ने गुर्जर अस्मितता से जोड़कर देखा। अखिलेश यादव की रैली में दादरी के मुस्लिम समाज के लोगों के अपेक्षा से बहुत कम लोग पहुंचे कि बात मेरे लिए जरूर चौकाने वाली थी।

यदि दोनों रैलियों की सफलता को भीड़, स्थानीय चुनावी राजनीति और पश्चिम उत्तर प्रदेश में व्यापक प्रभाव के रूप में देखे तो जेवर की जनसभा कुल मिलाकर सफल कही जा सकती है। जबकि दादरी की रैली आयोजकों के लिए व्यक्तिगत आधार पर संतुष्टि देने वाली हो सकती है। लेकिन स्थानीय पार्टी संगठन और आगामी विधानसभा चुनाव की दृष्टि से संतुष्ट करने वाला होगा, यह कहना अभी जल्दबाजी होगा। मंच पर जिस संख्या में पार्टी के नेता उपस्थित थे, उस अनुपात में रैली में पहुंची भीड़ और पार्टी कार्यरता बहुत कम थे। ऐसे में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में समाजवादी के पक्ष में कोई चमत्कारिक बदलाव होगा यह भी दूर की कौड़ी प्रतीत होती है।

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