मई का महीना, प्राधिकरणों में तबादलों का दौर और महंगाई की मार

Panchayat 24 (नोएडा): गौतम बुद्ध नगर में इस बार मई का महीना कुछ ऐसा आया मानो आसमान और सरकार ने जनता, अधिकारियों तथा कर्मचारियों की एक साथ परीक्षा लेने की ठान ली हो। एक ओर सूरज आग उगल रहा था, दूसरी ओर प्राधिकरणों में तबादलों की आँधी चल रही थी। धूप की तपिश केवल शरीर को झुलसा रही थी, लेकिन तबादलों की तपिश सीधे दिल और दिमाग पर असर कर रही थी। कहते हैं, “जिस पर बीतती है, वही जानता है” और तबादलों की इस गर्मी को वही समझ सकता है, जो इन दिनों लखनऊ के गलियारों से होकर गुज़रा हो।
प्राधिकरणों के वातानुकूलित कमरों में बैठे अधिकारी भी ऐसे बेचैन दिखाई देते थे, जैसे किसी किसान की खड़ी फसल पर ओलावृष्टि का खतरा मंडरा रहा हो। बाहर तापमान 45 डिग्री था, लेकिन भीतर तबादलों का तापमान उससे कहीं अधिक महसूस किया जा रहा था। हर कोई 31 मई का इंतजार कर रहा था। किसी को आशा थी कि उसका नाम सूची में नहीं होगा, तो किसी को भय था कि कहीं उसका नाम ऊपर से नीचे तक चमकता हुआ न मिल जाए।
एक अधिकारी बड़ी निश्चिंत मुद्रा में कहते सुने गए, “भाई, तबादला होगा तो चले जाएंगे। नौकरी यहाँ भी करनी है और वहाँ भी करनी है।” उनकी दृढ़ता की प्रशंसा करने को मन करता था, लेकिन चेहरे की शिकन और लखनऊ की ओर उठती निगाहें कुछ और ही कहानी कहती थीं। मालूम पड़ता था कि उन्होंने भी अपना तबादला रुकवाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी थी। आखिर आदमी की जुबान और मन का मेल हर समय कहाँ होता है? “हाथी के दाँत खाने के और, दिखाने के और” वाली कहावत ऐसे ही लोगों ले लिए कही गई है।
आखिर 31 मई आई और बीत गई। किसी के घर मिठाई बंटी, तो किसी के चेहरे पर उदासी छा गई। सत्ता के गलियारों से बहने वाली कृपा-गंगा में कुछ लोग भरपूर स्नान कर आए थे, जबकि कुछ किनारे बैठकर हाथ मलते रह गए। दुनिया का यही दस्तूर है। जिसे वरदान मिलता है, वह अपनी योग्यता का बखान करता है और जिसे नहीं मिलता, वह भाग्य को कोसता है।
खैर, धीरे-धीरे प्राधिकरणों में तबादलों का तूफान थमने लगा। नए अधिकारी कुर्सियों पर विराजमान हुए और पुराने अपने नए ठिकानों की ओर रवाना हो गए। प्राधिकरणों में फिर से फाइलों की आवाजाही शुरू हो गई। जो काम महीनों से रुके हुए थे, वे आगे बढ़ने लगे। नोएडा प्राधिकरण में नए टेंडरों पर लगी रोक हट गई। हजारों करोड़ रुपये के टेंडर ऐसे निकलने लगे, जैसे बरसात में नाले का पानी बह निकलता है। बिलों पर हस्ताक्षर होने लगे और अधिकारियों के कक्षों में ठेकेदारों की बैठकों की चहल-पहल लौट आई।
वरिष्ठ पत्रकार राजेश बैरागी ने इस दौर को “टेंडर स्वर्णकाल” की संज्ञा दी है। सच भी है, वर्षों से प्रतीक्षा कर रहे कई लोगों के चेहरे खिल उठे। लेकिन हर बहार अपने साथ कुछ पतझड़ भी लेकर आती है। इस बीच किसी ने यह जानने का गंभीर प्रयास नहीं किया कि पूर्व सीईओ द्वारा नए टेंडरों पर रोक आखिर किन परिस्थितियों में लगाई गई थी? क्या रोक हटाने से पहले ऐसी कोई व्यवस्था सुनिश्चित की गई, जिससे पूर्व में रही संभावित अनियमितताओं अथवा भ्रष्टाचार की गुंजाइश को समाप्त किया जा सके? यह प्रश्न अभी भी उत्तर की प्रतीक्षा में है।
इसी बीच दुनिया के दूसरे कोने में अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध छिड़ गया। युद्ध वहाँ हुआ, लेकिन उसकी आँच यहाँ तक पहुँच गई। पेट्रोल, डीजल और सीएनजी महंगे हो गए। महंगाई की बात चली तो प्राधिकरणों में तबादलों के दौरान होने वाली चर्चाएँ भी याद आ गईं। गलियारों में यह चर्चा आम थी कि महंगाई ने लखनऊ का बजट भी बढ़ा दिया है। हालांकि इन चर्चाओं की पुष्टि करना आसान नहीं है। क्योंकि हमाम के दरवाजों पर अति सतर्कता के पहरे होते हैं ।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच कुछ ठेकेदारों के चेहरों की हवाइयाँ उड़ी हुई हैं। बताया जा रहा है कि तबादलों के इस दौर में महंगाई की मार अंततः इन्हीं पर पड़ रही है। उनके लिए महंगाई की दर 4.5 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 10 प्रतिशत तक पहुँच रही है। ऐसे में कई ठेकेदार सिर पीटते हुए कह रहे हैं कि आखिर इतने भुगतान के बाद बनाएंगे क्या? बचाएंगे क्या? फिर सवाल यह भी खड़ा होता है कि इतने सब के बावजूद किसी ने हिम्मत करके कुछ बना भी दिया तो यह कहावत कही जाएगी “चल गया तो चंद तक वरना शाम तक” ??





