किसान, गौवंश और कुत्तों के बाद प्राधिकरण से उल्लूओं की मांग

Panchayat 24 : क्या उल्लू हमलावर होते हैं? सवाल को तोड़-मरोड़कर न लिया जाए। यहां बात उसी पक्षी-शिरोमणि उल्लू की हो रही है, जिसके चरित्र पर व्यंग्य करते हुए किसी शायर ने कह दिया था— “बर्बाद-ए-गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफी था, अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा, जब हर शाख पर उल्लू बैठा है।” वैसे यह उल्लूओं की दरियादिली ही कही जाएगी, वरना कोई भी इंसान इस पर मानहानि का वाद दायर कर देता।
विडंबना यह कि कुछ लोग उल्लू को अशुभ मानते है। वही उल्लू माता लक्ष्मी का वाहन भी है। ऐसे में कुछ लोग उसके दर्शन को शुभ और सौभाग्य मानते हैं। कुछ लोग लक्ष्मी-कृपा की कामना में उसे पाने के लिए न जाने कितने भागीरथ प्रयत्न करते हैं। मगर उल्लू-कृपा भी सबके भाग्य में कहां!
ग्रेटर नोएडा वेस्ट की ला रेजिडेंसिया हाउसिंग सोसायटी में वन विभाग की टीम ने सात उल्लुओं को पकड़कर सुरक्षित सूरजपुर वेटलैंड में छोड़ दिया। यह कार्रवाई उन निवासियों की शिकायत के बाद हुई, जो उल्लुओं के हमले में घायल हुए थे।
पकड़े गए उल्लुओं की शिकायत शायद यह रही होगी—“यदि हमारी सुरक्षा इतनी ही जरूरी थी तो हमारा आशियाना क्यों उजाड़ दिया?”
उल्लू समाज का सवाल अपने स्थान पर जायज है, पर उसका उत्तर सोसायटी के निवासियों के पास कहां से आएगा? उन्होंने भी तो अपनी गाढ़ी कमाई लगाकर घर खरीदा है। अब मनुष्य और उल्लू, दोनों अपने-अपने आशियाने के अधिकार की दुहाई दे रहे हैं।
मान लीजिए, उल्लू समाज भी प्राधिकरण के दरवाजे पर दस्तक दे और कहे—हमें अपने पुराने आशियाने की लीजबैक दी जाए अथवा प्राइम लोकेशन वाले सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट किया जाए। सवाल उठता है क्या उल्लूओं को उनका अधिकार मिल पाएगा?
गौवंश और श्वान (कुत्ता) समाज को इस दिशा में कुछ सफलता मिल चुकी है। मगर उल्लू समाज की मांग पर इतनी शीघ्र कोई विचार होगा, इसकी उम्मीद करना शायद उल्लूओं के उल्लू बनने जैसा ही होगा!
उधर, विधानसभा चुनाव से पहले किसानों की मांगों को लेकर प्राधिकरणों के बाहर धरने चल रहे हैं। अधिकारी किसानों की मान-मनुहार में जुटे हैं। आंदोलन की गूंज मुजफ्फरनगर तक पहुंच गई है। राकेश टिकैत भी पिछले कुछ समय से गौतम बुद्ध नगर के किसान आंदोलनो में काफ़ी रूचि ले रहे हैं। बुधवार को किसानों की समस्याओं को लेकर उन्होंने तीनों प्राधिकरणों के अधिकारियों से बातचीत की हैं। हालांकि खुले में आंदोलन और किसानों के नाम पर चंद समर्थकों के साथ बंद कमरों में अधिकारियों से बातचीत और कुछ महीनों बाद एक और नया आंदोलन बातचीत की प्रसंगिकता पर सवाल भी उठता है।
उल्लुओं की समस्या मगर कुछ अलग है। उनका पक्ष रखने के लिए कोई राकेश टिकेट नहीं है। उनका कहना है कि वे भी प्राधिकरण पहुंचकर अपनी मांग रखना चाहते हैं, लेकिन सवाल सुरक्षा का है। क्या है कि वहाँ तो पहले से ही हर कोई उल्लू पकड़ने को तैयार बैठा है। जिसको मौका मिला उल्लू उसके हाथ बाकी माता लक्ष्मी से प्रार्थना करें की अगली बार उल्लू उनके भी हाथ लग जाएं।




