जेवर एयरपोर्ट को लेकर भाजपा की श्रेय राजनीति को मुख्यमंत्री के बयान ने दी दिशा

डॉ देवेंद्र कुमार शर्मा
Panchayat 24 (बुलंदशहर) : नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के निर्माण के साथ-साथ गौतमबुद्ध नगर भाजपा के भीतर भी एक समानांतर राजनीतिक कथा आकार लेती रही है। यह कथा एयरपोर्ट निर्माण के श्रेय को लेकर चली राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की है। लंबे समय से भाजपा के दो प्रभावशाली गुट इस महत्वाकांक्षी परियोजना का अधिकाधिक श्रेय अपने पक्ष में स्थापित करने का प्रयास करते रहे। यह प्रतिस्पर्धा केवल राजनीतिक दावों तक सीमित नहीं रही, बल्कि कई अवसरों पर दोनों पक्षों ने अपने आचरण और सार्वजनिक गतिविधियों के माध्यम से भी एक-दूसरे पर बढ़त लेने का प्रयास किया। अनेक अवसरों पर राजनीतिक शिष्टाचार भी इस प्रतिस्पर्धा की भेंट चढ़ता दिखाई दिया। किंतु मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक सार्वजनिक वक्तव्य ने इस पूरी बहस को एक नया आयाम दे दिया।
दरअसल, जेवर में अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट स्थापित करने का विचार कोई नया नहीं था। पिछले दो दशकों से यह प्रस्ताव विभिन्न स्तरों पर चर्चा का विषय रहा, किंतु लंबे समय तक यह केवल एक महत्वाकांक्षी योजना बनकर ही रह गया।
परिस्थितियाँ वर्ष 2014 में बदलीं, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार बनी। गौतमबुद्ध नगर से सांसद डॉ. महेश शर्मा को संस्कृति एवं पर्यटन मंत्रालय का राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) तथा नागरिक उड्डयन मंत्रालय में राज्य मंत्री का दायित्व मिला। इसी कालखंड में जेवर एयरपोर्ट परियोजना को नीतिगत स्तर पर नई गति प्राप्त हुई। केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों के बीच समन्वय स्थापित करने, आवश्यक अनुमतियाँ दिलाने तथा परियोजना के समक्ष मौजूद प्रशासनिक एवं नीतिगत अवरोधों को दूर कराने में डॉ. महेश शर्मा की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।
नीतिगत स्वीकृतियाँ मिलने के बाद सबसे बड़ी चुनौती भूमि अधिग्रहण की थी। उस समय उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार थी और विभिन्न कारणों से परियोजना अपेक्षित गति प्राप्त नहीं कर सकी।
वर्ष 2017 में उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी और योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने। इसी चुनाव में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए ठाकुर धीरेंद्र सिंह जेवर विधानसभा क्षेत्र से विधायक निर्वाचित हुए। केंद्र और राज्य—दोनों स्तरों पर एक ही दल की सरकार होने से परियोजना को निर्णायक गति मिली।
भूमि अधिग्रहण का दायित्व यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यीडा) के पास था। किसानों को अपनी भूमि परियोजना के लिए उपलब्ध कराने हेतु तैयार करना सरल कार्य नहीं था। राज्य सरकार, यीडा तथा स्थानीय प्रशासन ने किसानों के साथ लगातार संवाद स्थापित किया। इस प्रक्रिया में स्थानीय विधायक धीरेंद्र सिंह की भी भूमिका रही।
जैसे-जैसे एयरपोर्ट परियोजना मूर्त रूप लेने लगी, वैसे-वैसे भाजपा के भीतर श्रेय की राजनीति भी तेज होती गई।
एक पक्ष का तर्क रहा कि यदि केंद्र स्तर पर डॉ. महेश शर्मा नीतिगत बाधाएँ दूर नहीं कराते, तो यह परियोजना कभी आगे नहीं बढ़ पाती। वहीं दूसरा पक्ष यह दावा करता रहा कि यदि स्थानीय स्तर पर किसानों का विश्वास अर्जित नहीं किया जाता, तो एयरपोर्ट केवल कागज़ों तक ही सीमित रह जाता।
सोशल मीडिया पर दोनों पक्षों के समर्थकों ने अपने-अपने नेताओं को परियोजना का सबसे बड़ा सूत्रधार सिद्ध करने का अभियान चलाया। विशेष रूप से विधायक धीरेंद्र सिंह लगातार एयरपोर्ट निर्माण की प्रगति, नई जानकारियों और गतिविधियों को सोशल मीडिया के माध्यम से जनता तक पहुँचाते रहे। अनेक अवसरों पर निर्माण एजेंसी अथवा संबंधित अधिकारियों की औपचारिक घोषणाओं से पहले भी एयरपोर्ट से जुड़ी सूचनाएँ उनके माध्यम से सार्वजनिक हुईं। इससे आम जनमानस में यह धारणा बनने लगी कि एयरपोर्ट परियोजना के स्थानीय संचालन और प्रगति का नेतृत्व वही कर रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे श्रेय की प्रतिस्पर्धा में बढ़त बनाने की एक रणनीति के रूप में भी देखा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा एयरपोर्ट के उद्घाटन के अवसर पर एक नया राजनीतिक विवाद सामने आया। उद्घाटन शिलापट्ट पर स्थानीय सांसद डॉ. महेश शर्मा का नाम अंकित था, जबकि विधायक धीरेंद्र सिंह का नाम उसमें शामिल नहीं था। इसे लेकर विधायक के समर्थकों ने सार्वजनिक रूप से असंतोष भी व्यक्त किया।
इसके कुछ समय बाद पहली व्यावसायिक उड़ान का कार्यक्रम भी मुख्यतः विधायक धीरेंद्र सिंह केंद्रित दिखाई दिया। विरोधी गुट के अनेक नेताओं को कार्यक्रम में अपेक्षित महत्व नहीं मिला। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा शुरू हुई कि मानो धीरेंद्र सिंह और एयरपोर्ट एक-दूसरे के पर्याय बन गए हों। बाद में एयरपोर्ट परिसर में यात्रियों से बातचीत करते हुए उनके कई वीडियो भी सोशल मीडिया पर सामने आए। इन घटनाओं ने ऐसी धारणा को और बल दिया कि एयरपोर्ट से जुड़ी राजनीतिक पहचान का केंद्र स्थानीय स्तर पर धीरेंद्र सिंह बनते जा रहे हैं। उस समय विपक्षी गुट की अपेक्षाकृत शांत प्रतिक्रिया से यह संदेश भी गया कि श्रेय की इस प्रतिस्पर्धा में फिलहाल धीरेंद्र सिंह बढ़त बनाए हुए हैं।
हालाँकि यह स्थिति अधिक समय तक कायम नहीं रही। कुछ ही समय बाद नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर सांसद डॉ. महेश शर्मा के नेतृत्व में आवास समिति की बैठक आयोजित हुई। इस बैठक में गौतमबुद्ध नगर के अधिकांश जनप्रतिनिधि, भाजपा संगठन के पदाधिकारी तथा बुलंदशहर और अलीगढ़ के जनप्रतिनिधि उपस्थित रहे, जबकि विधायक धीरेंद्र सिंह इसमें अनुपस्थित रहे। राजनीतिक हलकों में इस अनुपस्थिति को लेकर विभिन्न प्रकार की चर्चाएँ हुईं। अनेक विश्लेषकों ने इसे पहली व्यावसायिक उड़ान के आयोजन के बाद भाजपा के दूसरे गुट की राजनीतिक सक्रियता तथा संगठन के भीतर शक्ति-संतुलन का संकेत माना।
इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट अब केवल विकास का प्रतीक नहीं रहा, बल्कि भाजपा की स्थानीय राजनीति का भी एक महत्वपूर्ण प्रतीक बन चुका है। इसके श्रेय को लेकर दोनों गुटों के बीच मनोवैज्ञानिक प्रतिस्पर्धा लगातार गहराती गई और राजनीतिक पर्यवेक्षकों की निगाहें इस बात पर टिक गईं कि अगली राजनीतिक चाल किस पक्ष की ओर से चलेगी।
इसी बीच 18 जुलाई को बुलंदशहर में आयोजित एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने संबोधन के दौरान कहा—
“जेवर एयरपोर्ट भले ही डॉ. महेश शर्मा द्वारा जेवर में बनवाया गया हो, लेकिन इसका सबसे अधिक लाभ बुलंदशहर को मिलेगा। यह एयरपोर्ट पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश और भारत की समृद्धि का आधार बनेगा।”
मुख्यमंत्री का यह वक्तव्य राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जब भाजपा के भीतर एयरपोर्ट निर्माण के श्रेय को लेकर लंबे समय से मनोवैज्ञानिक प्रतिस्पर्धा चल रही थी, तब मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक मंच से डॉ. महेश शर्मा का उल्लेख करते हुए उन्हें इस परियोजना से जोड़ा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल औपचारिक प्रशंसा भर नहीं थी, बल्कि इसने श्रेय संबंधी बहस को नई दिशा दे दी। विशेष महत्व इसलिए भी माना जा रहा है क्योंकि राजनीतिक हलकों में यह धारणा लंबे समय से रही है कि विधायक धीरेंद्र सिंह स्वयं को मुख्यमंत्री का निकटस्थ मानते हैं।
निस्संदेह, नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट जैसी विशाल और बहुआयामी परियोजना का श्रेय किसी एक व्यक्ति को देना उचित नहीं होगा। ऐसी परियोजनाएँ केंद्र और राज्य सरकारों, प्रशासन, स्थानीय जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों, किसानों तथा अनेक संस्थाओं के सामूहिक प्रयासों का परिणाम होती हैं। किंतु राजनीति का स्वभाव यही है कि विकास की प्रत्येक बड़ी उपलब्धि अंततः श्रेय की राजनीति का विषय बन जाती है। गौतमबुद्ध नगर भाजपा में भी यही परिदृश्य देखने को मिला।
फिर भी, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के 18 जुलाई के सार्वजनिक वक्तव्य ने इस पूरे विमर्श को नया राजनीतिक संदर्भ अवश्य प्रदान किया है। राजनीतिक हलकों में इसे एक ऐसे संदेश के रूप में देखा जा रहा है, जिसने लंबे समय से चली आ रही श्रेय की प्रतिस्पर्धा को निर्णायक मोड़ दे दिया।
आने वाले समय में इतिहास इस परियोजना का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं करेगा कि किस नेता ने कितनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज कराई, बल्कि इस आधार पर भी करेगा कि परियोजना के विभिन्न चरणों में किसकी भूमिका क्या रही और उसे सार्वजनिक एवं राजनीतिक स्तर पर किस प्रकार किसकी भूमिका को किसने स्वीकार किया।





