नोएडा प्राधिकरण

ट्रांसफर-पोस्टिंग, नए कार्यालय में मनमाफिक कमरा और टेंडरों पर लगी रोक हटवाने के लिए बेचैनी… उधर नाले में बुझते रहे युवराज और आर्यन जैसे घरों के चिराग, फिर बेनकाब हुई नोएडा प्राधिकरण की प्राथमिकताएं

डॉ देवेंद्र कुमार शर्मा

Panchayat 24 (नोएडा):

“जब किसी व्यवस्था की प्राथमिकताएं नागरिकों की सुरक्षा से हटकर कुर्सियों, कमरों और ठेकों के इर्द-गिर्द सिमट जाएं, तब नाले सिर्फ पानी नहीं बहाते, वे जिम्मेदारियों को भी बहा ले जाते हैं।”

नोएडा के लोग अभी सेक्टर – 150 में हुए युवराज मेहता कांड को पूरी तरह भूल भी नहीं सका था कि एक और इंजीनियर कि नाले में डूबने से हुई मौत नए फिर लोगों के घाव को हरा कर दिया है। युवराज मेहता कांड की कड़वी यादें लोगों के जन्म में फिर ताजा हो उठी है।

दरअसल, सेक्टर-58 में 27 वर्षीय इंजीनियर आर्यन की मौत कोई आकस्मिक दुर्घटना नहीं लगती। यह उसी प्रशासनिक संस्कृति का दूसरा अध्याय प्रतीत होती है, जिसकी पहली भयावह पटकथा कुछ महीने पहले सेक्टर-150 में इंजीनियर युवराज मेहता की मौत के रूप में लिखी गई थी। तब भी शहर ने सवाल पूछे थे, जांच बैठी थी, दावे हुए थे और आश्वासन दिए गए थे कि अब ऐसा नहीं होगा। लेकिन आज फिर एक परिवार का इकलौता सहारा नाले में समा गया। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार नाम युवराज नहीं, आर्यन है।

आर्यन रोज की तरह अपने कार्यालय जा रहे थे। बारिश ने सड़क और नाले के बीच की सीमा मिटा दी थी। लंबे समय से टूटा पड़ा स्लैब पानी में छिपा था। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार ट्रांसफार्मर में शॉर्ट सर्किट हुआ, वह घबराए, पैर फिसला और कुछ ही क्षणों में उनकी जिंदगी खत्म हो गई। सवाल यह नहीं कि वह कैसे गिरे। असली सवाल यह है कि वह टूटा हुआ स्लैब आखिर महीनों तक वहीं क्यों पड़ा रहा?

यही वह प्रश्न है जो सीधे नोएडा प्राधिकरण की नियत, कार्यशैली और प्राथमिकताओं के दरवाजे पर दस्तक देता है।

जब शहर को मरम्मत चाहिए थी, तब प्राधिकरण को तबादलों की चिंता थी

मानसून आने से पहले का समय शहर के नालों की सफाई, टूटे स्लैब बदलने और जलभराव वाले स्थानों को सुरक्षित बनाने का होता है। लेकिन उस दौरान प्राधिकरण के गलियारों में सबसे अधिक चर्चा किस बात की थी?

कौन लखनऊ में अपनी पोस्टिंग बचाएगा, किसका तबादला रुकेगा, किसे बेहतर जिम्मेदारी मिलेगी और नए प्रशासनिक भवन में किस अधिकारी को बड़ा और सुविधाजनक कक्ष मिलेगा। ऐसा लगता था मानो शहर की नहीं, कुर्सियों की सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता बन गई हो।

विडंबना यह है कि जिन अधिकारियों का अधिकांश समय लखनऊ में चल रही गतिविधियों की जानकारी और अपनी प्रशासनिक सुविधाओं को सुनिश्चित करने में बीता, उनके शहर में एक युवा इंजीनियर टूटा स्लैब पहचान नहीं पाया क्योंकि वह बारिश के पानी में छिपा हुआ था।

टेंडरों की चिंता विकास के लिए थी या व्यवस्था के लिए?

पूर्व मुख्य कार्यपालक अधिकारी ने विकास कार्यों में कथित भ्रष्टाचार की दुर्गंध महसूस होने पर नए टेंडरों पर रोक लगा दी थी। जांच शुरू हुई। उम्मीद थी कि पहले व्यवस्था साफ होगी, फिर विकास होगा।

लेकिन उसके बाद प्राधिकरण का सबसे बड़ा अभियान क्या था?यह नहीं कि शहर के खतरनाक स्थानों का सर्वे हो। यह नहीं कि खुले नाले सुरक्षित किए जाएं। यह भी नहीं कि मानसून से पहले जोखिम वाले स्थानों को चिन्हित कर दुरुस्त किया जाए।

पूरी ऊर्जा इस बात में लग गई कि किसी भी तरह नए टेंडरों पर लगी रोक हट जाए। तर्क दिया गया कि यदि रोक जारी रही तो विकास कार्य ठप पड़ जाएंगे और शहर का नुकसान होगा।

बाद में सीईओ बदले, रोक हट गई, सैकड़ों करोड़ रुपये के विकास कार्य फिर शुरू हो गए। लेकिन आज नागरिक पूछ रहे हैं—उन सैकड़ों करोड़ रुपये का विकास आखिर जमीन पर कहां दिखाई देता है?

यदि विकास हुआ है तो सेक्टर-58 का टूटा स्लैब क्यों नहीं बदला? यदि विकास हुआ है तो बारिश में सड़क और नाले का अंतर क्यों मिट जाता है? यदि विकास हुआ है तो युवराज मेहता के बाद आर्यन की मौत क्यों हुई? और यदि इन प्रश्नों का उत्तर नहीं है, तो फिर विकास की परिभाषा आखिर क्या है?

क्या विकास का मतलब सिर्फ टेंडर जारी होना है?

किसी भी शहर का विकास नई सड़कें बनाने से नहीं, बल्कि पुरानी खामियों को दूर करने से मापा जाता है। करोड़ों रुपये की परियोजनाएं, ऊंची इमारतें और चमकदार प्रस्तुतियां तब अर्थहीन हो जाती हैं, जब एक साधारण नागरिक रोजमर्रा के रास्ते पर सुरक्षित घर से दफ्तर तक भी नहीं पहुंच पाता। कहावत है—“घर की नींव कमजोर हो तो महल भी ज्यादा दिन नहीं टिकता।” नोएडा की चमकती तस्वीर के पीछे यही कमजोर नींव बार-बार सामने आ रही है।

हर मौत के बाद जांच, लेकिन जिम्मेदारी कब?

युवराज मेहता की मौत के बाद एसआईटी बनी। निरीक्षण हुए। पानी भरे गड्ढे कि बेरीकेटिंग कि गई। खुले नालों को सुरक्षित करने के निर्देश दिए गए। टूटे स्लैब बदलने की बातें हुईं। अधिकारियों ने दावे किए कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति नहीं होगी।

लेकिन आर्यन की मौत बताती है कि कागजों पर हुई कार्रवाई और जमीन पर हुई कार्रवाई में कितना बड़ा अंतर है। हमारे प्रशासनिक तंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि यहां दुर्घटनाएं व्यवस्था नहीं बदलतीं, सिर्फ फाइलों की संख्या बढ़ाती हैं।

अब जवाब सिर्फ पुलिस नहीं, प्राधिकरण को भी देना होगा

आर्यन के परिजनों ने प्राधिकरण और बिजली विभाग पर लापरवाही के आरोप लगाए हैं। पुलिस अपनी जांच करेगी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट आएगी। संभव है किसी कर्मचारी पर कार्रवाई भी हो जाए। लेकिन क्या इससे मूल प्रश्न समाप्त हो जाएगा?

किसी प्यादे की बलि चढ़ाकर वजीर को फिर बचाया जाएगा?

क्या किसी जूनियर कर्मचारी को निलंबित कर देने से वह प्रशासनिक संस्कृति बदल जाएगी, जिसमें शहर से ज्यादा महत्व तबादलों, कमरों और ठेकों को मिलता है? क्या कभी यह भी जांच होगी कि मानसून से पहले जोखिम वाले स्थानों का निरीक्षण किस अधिकारी की जिम्मेदारी थी? किसने प्रमाणित किया कि नाले सुरक्षित हैं? किसने रिपोर्ट दी कि तैयारियां पूरी हैं? और यदि रिपोर्ट सही थी तो फिर आर्यन की मौत कैसे हुई? या फिर मामला बढ़ता देख फिर किसी प्यादे की बलि देकर किसी वजीर को फिर बचा लिया जाएगा।

आर्यन की मौत नहीं, व्यवस्था की परीक्षा है

युवराज मेहता और आर्यन दो अलग-अलग व्यक्ति थे, लेकिन उनकी मौत का कारण एक ही व्यवस्था की विफलता प्रतीत होती है। आज सवाल सिर्फ एक टूटे स्लैब का नहीं है। सवाल उस सोच का है, जिसमें फाइलें तेजी से चलती हैं लेकिन मरम्मत नहीं, टेंडर आगे बढ़ते हैं लेकिन सुरक्षा नहीं, और प्राथमिकताएं बदल जाती हैं लेकिन व्यवस्था नहीं।

कहावत है—“जब राजा सोता है तो चौकीदार भी ऊंघने लगता है।” यदि शीर्ष स्तर पर जवाबदेही की संस्कृति कमजोर होगी तो नीचे तक लापरवाही सामान्य व्यवहार बन जाएगी। नोएडा अब यह जानना चाहता है कि क्या विकास का अर्थ सिर्फ सैकड़ों करोड़ रुपये के टेंडर जारी करना है, या फिर ऐसा शहर बनाना भी है जहां कोई आर्यन सिर्फ इसलिए न मरे कि बारिश के पानी ने एक टूटा हुआ स्लैब छिपा दिया था?

युवराज के बाद आर्यन… और यदि प्राथमिकताएं नहीं बदलीं तो शायद कल कोई तीसरा नाम भी इस सूची में जुड़ जाएगा। तब फिर वही प्रेस विज्ञप्तियां होंगी, वही जांच होगी, वही संवेदनाएं व्यक्त की जाएंगी। लेकिन तब तक किसी और घर का चिराग बुझ चुका होगा।

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