नोएडा प्राधिकरण

नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण : गृहप्रवेश तो हो गया, क्या गृह-शांति भी होगी?

Panchayat 24 (नोएडा) : भारतीय परंपरा में नया घर केवल ईंट, पत्थर और सीमेंट का ढांचा नहीं होता। वह नई शुरुआत का प्रतीक होता है। गृहप्रवेश के समय लोग दरवाजे पर शुभचिह्न बनाते हैं, मंत्रोच्चार करते हैं, हवन करते हैं और यह कामना करते हैं कि पुराने मतभेद, कटुताएँ और दुर्भाग्य चौखट के बाहर ही रह जाएँ। भीतर केवल सकारात्मकता, विश्वास और समृद्धि प्रवेश करे।

नोएडा प्राधिकरण के सेक्टर-96 स्थित भव्य मुख्यालय के उद्घाटन के समय भी कुछ ऐसी ही अपेक्षाएँ थीं। वर्षों की प्रतीक्षा, सैकड़ों करोड़ रुपये की लागत और आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित इस भवन से जनता को यह संदेश मिलना था कि अब प्रशासन भी नई सोच, नई कार्यसंस्कृति और नई पारदर्शिता के साथ आगे बढ़ेगा। उम्मीद थी कि अधिकारी पुराने विवादों को पीछे छोड़कर जनसेवा को सर्वोच्च प्राथमिकता देंगे।

मीडिया में चल रही खबरों के अनुसार एक ओर वेस्ट-टू-एनर्जी परियोजना से जुड़े कथित वीडियो की जांच ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है, जहाँ प्रश्न यह नहीं रह गया कि रिपोर्ट तैयार हुई या नहीं, बल्कि यह बन गया कि सत्य किस रिपोर्ट में कैद है। यदि एक फॉरेंसिक जांच किसी निष्कर्ष तक पहुँचती है और दूसरी संभावित जांच उसका उलटा दावा करती है, तो सबसे बड़ा प्रश्न किसी व्यक्ति की बेगुनाही या दोष नहीं, बल्कि पूरी जांच प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर खड़ा होता है। जब सत्य और असत्य के बीच की रेखा ही फाइलों में उलझ जाए, तब प्रशासनिक पारदर्शिता भी संदेह के घेरे में आ जाती है।

दूसरी ओर, नए भवन में बड़े कमरे को लेकर अधिकारियों के बीच नामपट्टिकाएँ उखाड़ने और पुनः लगाने की घटनाएँ यह संकेत देती हैं कि कभी-कभी कार्यालयों में कुर्सी से पहले कमरा प्रतिष्ठा का विषय बन जाता है। जिस भवन से जनता को समाधान मिलने की उम्मीद थी, वहाँ शुरुआती चर्चा कमरों के आकार और कब्जे की होने लगे तो स्वाभाविक है कि लोग सवाल पूछेंगे—क्या भवन बदला है या केवल पता?

विडंबना यह है कि जिस भवन का निर्माण प्रशासनिक दक्षता और बेहतर कार्यसंस्कृति के लिए किया गया, उसी भवन की शुरुआत ने व्यवस्था की पुरानी प्रवृत्तियों की झलक भी सामने ला दी। कहीं जांच रिपोर्ट अपनी मंज़िल तक पहुँचने से पहले ठहर जाती है, तो कहीं कमरे की चौखट पर अधिकार का संघर्ष शुरू हो जाता है। ऐसे में यह आशंका स्वाभाविक है कि यदि ऊर्जा का बड़ा हिस्सा आंतरिक उलझनों में खर्च होगा, तो जनता के मुद्दों तक उसकी कितनी गर्माहट पहुँच पाएगी?

यह किसी एक अधिकारी या एक घटना का प्रश्न नहीं है। यह उस कार्यसंस्कृति का प्रश्न है जो किसी भी संस्था की वास्तविक पहचान बनाती है। आधुनिक भवन, आकर्षक इंटीरियर और विशाल कक्ष प्रशासन की प्रतिष्ठा अवश्य बढ़ाते हैं, किंतु किसी संस्थान की असली ऊँचाई उसकी दीवारों से नहीं, बल्कि उसके निर्णयों, पारदर्शिता और आपसी विश्वास से मापी जाती है।

नोएडा प्राधिकरण का नया मुख्यालय निश्चित ही विकास का प्रतीक है। अब आवश्यकता इस बात की है कि इस भवन में केवल कार्यालयों का स्थानांतरण न हो, बल्कि कार्यशैली का भी स्थानांतरण हो—जहाँ व्यक्तिगत अहंकार की जगह संस्थागत गरिमा ले, पद की प्रतिष्ठा से अधिक जनहित का सम्मान हो और हर निर्णय यह विश्वास दिलाए कि नया भवन केवल नया पता नहीं, बल्कि नई सोच का भी पता है।

क्योंकि किसी भी गृहप्रवेश की सफलता इस बात से नहीं आँकी जाती कि घर कितना भव्य है, बल्कि इस बात से तय होती है कि उस घर में प्रवेश करने वाले अपने साथ कौन-सी संस्कृति लेकर आए हैं।

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