स्पेशल स्टोरी

मुख्यमंत्री का दौरा : जेवर विधायक बनाम नोएडा विधायक और मुख्यमंत्री के दौरे की प्रासंगिकता

डॉ देवेंद्र कुमार शर्मा

Panchayat 24 (संपादकीय)। किसी जिले में मुख्यमंत्री का दौरा केवल लोकार्पण और शिलान्यास का सरकारी कार्यक्रम नहीं होता, बल्कि यह स्थानीय जनप्रतिनिधियों के लिए अपनी राजनीतिक दृष्टि, जनसरोकार और नेतृत्व क्षमता प्रदर्शित करने का सबसे बड़ा अवसर भी होता है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का 27 जून का लगभग पांच घंटे का गौतमबुद्धनगर दौरा भी विकास परियोजनाओं से अधिक दो विधायकों की अलग-अलग कार्यशैली और राजनीतिक प्राथमिकताओं को लेकर चर्चा का विषय बन गया।

मुख्यमंत्री ने यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण क्षेत्र में सेल सोलर पी-6 प्राइवेट लिमिटेड तथा अंबर एंटरप्राइजेज-एसेंट सर्किट प्राइवेट लिमिटेड की औद्योगिक परियोजनाओं का शिलान्यास किया। इसके बाद नोएडा प्राधिकरण के सेक्टर-96 स्थित नवनिर्मित मुख्यालय का लोकार्पण करते हुए नोएडा और दादरी विधानसभा क्षेत्रों की 2,479 करोड़ रुपये की विकास परियोजनाओं का उद्घाटन एवं शिलान्यास किया।

दिन के दोनों प्रमुख कार्यक्रम अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में थे। जेवर में विशाल जनसभा थी, जबकि नोएडा में प्राधिकरण सभागार का सीमित और औपचारिक आयोजन। यही अंतर दोनों स्थानीय विधायकों की भूमिका में भी स्पष्ट दिखाई दिया।

जेवर में विधायक धीरेन्द्र सिंह समर्थकों और नारों के बीच पूरे आयोजन के केंद्र में रहे। माहौल कई बार सरकारी कार्यक्रम से अधिक राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का प्रतीत हुआ। समर्थकों का उत्साह स्वाभाविक था, लेकिन इसी बीच यमुना प्राधिकरण क्षेत्र के किसानों, भू-स्वामियों, आवंटियों और निवेशकों की वर्षों पुरानी समस्याएं मुख्यमंत्री के समक्ष मंच पर रखने से धीरेन्द्र सिंह चूक गए।

इसके विपरीत, नोएडा विधायक पंकज सिंह ने बिना किसी राजनीतिक प्रदर्शन के मुख्यमंत्री के समक्ष फ्लैट खरीदारों और किसानों की समस्याओं को प्रमुखता से उठाया। उन्होंने इनके शीघ्र समाधान का आग्रह किया। साथ ही नवनिर्मित प्राधिकरण मुख्यालय के उद्घाटन अवसर पर अधिकारियों और कर्मचारियों को यह स्पष्ट संदेश भी दिया कि भवन की वास्तविक उपयोगिता तभी सिद्ध होगी, जब यहां आने वाले नागरिकों की शिकायतों का समयबद्ध, पारदर्शी और अधिकतम ऑनलाइन समाधान सुनिश्चित किया जाएगा।

यमुना प्राधिकरण क्षेत्र आज भी भूमि अधिग्रहण, मुआवजा, आबादी निस्तारण, आवंटियों की समस्याओं और औद्योगिक निवेश से जुड़े अनेक प्रश्नों से जूझ रहा है। मुख्यमंत्री की मौजूदगी इन मुद्दों को सर्वोच्च स्तर तक पहुंचाने का सबसे उपयुक्त अवसर थी, लेकिन यह अवसर अपेक्षित रूप से उपयोग में नहीं आ सका।

मुख्यमंत्री का यह दौरा अनायास ही दो अलग-अलग राजनीतिक कार्यशैलियों का आईना बन गया। एक ओर समर्थकों की भीड़ और नारों के बीच राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराने का प्रयास दिखाई दिया, तो दूसरी ओर बिना शोर-शराबे के जनता के वास्तविक मुद्दों को मुख्यमंत्री तक पहुंचाने की गंभीरता दिखी।

इस दौरे ने एक और महत्वपूर्ण प्रश्न भी खड़ा किया। जेवर की सभा में कुछ लोगों की यह टिप्पणी सुनाई दी कि बार-बार मुख्यमंत्री की सभाओं में आमजन आखिर कब तक अपने रोज़गार और कामकाज छोड़कर शामिल होते रहेंगे? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बहुत कम अंतराल पर एक ही क्षेत्र में लगातार मुख्यमंत्री के दौरे उनके आगमन की विशिष्टता को कम कर देते हैं।

निस्संदेह मुख्यमंत्री पूरे प्रदेश के मुखिया हैं और उन्हें प्रदेश के किसी भी हिस्से में जाकर विकास कार्यों की समीक्षा करने का पूर्ण अधिकार है। किंतु यदि परिस्थितियां अत्यंत आवश्यक न हों, तो बार-बार होने वाले ऐसे दौरों से बचना भी प्रशासनिक दृष्टि से उचित माना जा सकता है। प्रत्येक दौरे में पूरा प्रशासनिक तंत्र, पुलिस और प्राधिकरण कई दिनों तक तैयारियों में व्यस्त रहता है। भले ही इसका प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष राजनीतिक लाभ दल अथवा व्यक्ति विशेष को हो सकता है लेकिन भारी सरकारी संसाधन खर्च होते हैं और सबसे अधिक प्रभावित आम नागरिक होता है, जिसकी शिकायतों और दैनिक कार्यों की सुनवाई कई बार पीछे छूट जाती है।

विकास की समीक्षा आवश्यक है, लेकिन आज के तकनीकी युग में अनेक कार्य डिजिटल माध्यमों से भी प्रभावी ढंग से किए जा सकते हैं। इसलिए जनहित की दृष्टि से मुख्यमंत्री, मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों के दौरे वहीं तक सीमित रहने चाहिए, जहां उनकी प्रत्यक्ष उपस्थिति वास्तव में अनिवार्य हो। शासन का उद्देश्य केवल कार्यक्रम आयोजित करना नहीं, बल्कि जनता के समय, संसाधनों और विश्वास—तीनों का सम्मान करना भी होना चाहिए।

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