समाजवाद की टोपी राजकुमार भाटी के सिर पर फिट नहीं बैठ रही है?

डॉ देवेंद्र कुमार शर्मा
Panchayat 24 : पश्चिमी विचारक सी. ई. एम. जोड (C. E. M. Joad) का प्रसिद्ध कथन है—“समाजवाद एक ऐसी टोपी है, जिसका आकार इसलिए बिगड़ गया है, क्योंकि हर कोई उसे पहनता है।” आशय यह है कि अलग-अलग राजनीतिक दल और विचारक समाजवाद की व्याख्या अपने-अपने ढंग से करते हैं। जब लगभग हर विचारधारा स्वयं को समाजवादी बताने लगे, तो समाजवाद का मूल स्वरूप और उसकी निश्चित परिभाषा धुंधली पड़ने लगती है। क्या समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजकुमार भाटी भी समाजवाद की टोपी के नीचे अपनी मूल राजनीतिक विचारधारा को छिपाए हुए हैं या मामला कुछ और है ? उनके हालिया विवादित बयानों को इसी कसौटी पर परखने की जरूरत है।
अध्यापन और पत्रकारिता से राजनीति में आए राजकुमार भाटी ने अपनी राजनीतिक यात्रा देहात मोर्चा से शुरू की। तत्कालीन सरकारें, विशेषकर समाजवादी सरकार उनके मुख्य निशाने पर रही लेकिन समाजवादी पार्टी से ही उन्हें राजनीतिक पहचान भी मिली। हालांकि वह देहात मोर्चा, भूतपूर्व प्रधानमंत्री वी पी सिंह की जन मोर्चा और समाजवादी पार्टी से कई बार दादरी विधानसभा का चुनाव भी लड़े लेकिन सफलता नहीं मिली।
समाजवादी पार्टी ने उन्हें पार्टी प्रवक्ता बनाया जिसके बाद वह टेलीविजन बहसों का चर्चित चेहरा बन गए। आजकल वह समाजवादी पार्टी के पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक—पीडीए—के नए सामाजिक गठजोड़ की मुखर पैरोकारी करते हैं। वह मनुस्मृति और ब्राह्मणवाद को स्व: परिभाषित करते हुए उनकी आलोचना करते हैं। उनका तर्क रहा है कि ब्राह्मणवाद का विरोध, ब्राह्मण समाज का विरोध नहीं है। लेकिन उनके कई बयान ब्राह्मणवाद और मनुस्मृति की आड़ में प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष ब्राह्मणों को ही निशाना बनाते हैं।
ब्राह्मण समाज की वैश्या से तुलना, जाट और गुर्जर समाज की महिलाओं को लेकर कथित टिप्पणियां तथा हिंदू देवी-देवताओं और धार्मिक मान्यताओं पर बयानों पर हंगामा मचा। हाल में एक कार्यक्रम में ब्रह्मा, विष्णु और महेश की पूजा न करने तथा राम-कृष्ण को भगवान न मानने की प्रतिज्ञा से जुड़ा वीडियो वायरल होने के बाद नया विवाद खड़ा हो गया है। उनके हिंदू धर्म छोड़ने की चर्चाएं भी हुईं, हालांकि उन्होंने धर्म छोड़ने की बात से इनकार किया। इस पूरे प्रकरण में उनके बयानों और उनके राजनीतिक निहितार्थों पर सवाल उठे हैं।
यहां प्रश्न आलोचना के अधिकार का नहीं, बल्कि उसकी निष्पक्षता और कसौटी का है। मनुस्मृति, ब्राह्मणवाद अथवा किसी धार्मिक मान्यता की आलोचना वैचारिक विमर्श का हिस्सा हो सकती है। लेकिन यदि सामाजिक कुरीतियों के विरोध में केवल एक वर्ग, धर्म या उसकी मान्यताओं को निशाना बनाया जाए और दूसरे अन्य वर्गों की समान समस्याओं पर मौन साध लिया जाए, तो सुधारवाद की निष्पक्षता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
ऐसे में सवाल उठता है क्या राजकुमार भाटी जानबूझकर किसी राजनीतिक रणनीति के तहत ऐसे बयान दे रहे हैं, या उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता उन्हें इस दिशा में ले जा रही है या फिर विवादित बयानों को ही वह राजनीतिक सफलता का माध्यम मान लिया है ? चूंकि वह एक अध्ययनशील और पठन-पाठन में रुचि रखते वाले इंसान हैं। इसलिए उनके बयानों को महज अनजाने में हुई चूक मान लेना उचित नहीं है।
हिंदी फिल्म लगे रहो मुन्ना भाई में गांधी दर्शन के अत्यधिक अध्ययन से उपजे ‘केमिकल लोचा’ का रूपक यहां याद आता है। क्या पीडीए की राजनीति को मजबूत करने के प्रयास में राजकुमार भाटी ने ब्राह्मणवाद, सवर्ण समाज और हिंदू धार्मिक मान्यताओं की आलोचना से जुड़े साहित्य को इस हद तक आत्मसात कर लिया है कि उसकी अभिव्यक्ति उनके बयानों में लगातार दिखाई देने लगी है?
जिस समाजवादी पार्टी ने बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों में पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) से अब P से पंडित और A से अगड़े की बात करनी शुरू कर दी हो। सॉफ्ट हिन्दू वाली छवि गढ़ने के प्रयास किए जा रहे हो वहाँ राजकुमार भाटी के बयान समाजवादियों की चिंता बढ़ा रहे है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय सचिव और राजयसभा सांसद रामगोपाल यादव और वरिष्ठ नेता शिवपाल यादव के हालिया बयान यही साबित करते हैं। तो क्या माना लिया जाए कि राजकुमार भाटी के सिर पर समाजवादी टोपी फिट नहीं बैठ रही है या फिर समाजवादी टोपी को वह अपनी मर्जी का आकर देना चाहते हैं?




