तेरा वाला जेन जी बनाम मेरा वाला जेन जी

Panchayat 24 (डॉ देवेंद्र कुमार शर्मा) : दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट प्रश्नपत्र प्रकरण को लेकर शुरू हुए आंदोलनों के बाद देश की राजनीति में जेन जी की भूमिका अचानक चर्चा के केंद्र में आ गई। राजनीतिक दल युवाओं के मुद्दों और उनकी आकांक्षाओं को अपने-अपने विमर्श का हिस्सा बना रहे हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी छात्रों के बीच जाकर वही सवाल उठाए, जो आंदोलन के दौरान सामने आए थे। दूसरी ओर, उनके कार्यक्रम से जुड़े कुछ कथित आपत्तिजनक बयानों को लेकर भाजपा और कांग्रेस आमने-सामने हैं।
सवाल यह है कि क्या किसी राजनीतिक मंच पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या उनकी माता के प्रति अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करने का कोई तार्किक औचित्य हो सकता है? और क्या यह मान लिया जाए कि किसी कार्यक्रम में मौजूद सभी छात्र या युवा उस वक्ता के विचारों से सहमत थे? इसका उत्तर स्वयं जेन जी को ही तलाशना होगा।
इस बहस की दूसरी तस्वीर गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय में आयोजित ‘प्रेरणा विमर्श-2026’ में दिखाई दी। आरएसएस और भाजपा से जुड़े इस आयोजन में बड़ी संख्या में युवा उपस्थित थे। समापन समारोह में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राहुल गांधी का नाम लिए बिना उन्हें ‘कांग्रेस का राजकुमार’ संबोधित करते हुए महिला अपमान और भारतीय सभ्यता-संस्कृति के अपमान का आरोप लगाया।
क्या यह आयोजन भी जेन जी से संवाद और विमर्श का एक राजनीतिक प्रयास था? संभवतः हाँ। लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि किसी राजनीतिक दल के आयोजन में स्वाभाविक रूप से उसी दल अथवा उसकी विचारधारा से प्रभावित लोगों की उपस्थिति अधिक होगी। इसलिए वहां मौजूद युवाओं की प्रतिक्रिया को पूरे जेन जी की सामूहिक राय मान लेना भी उचित नहीं होगा।
कार्यक्रम के दौरान कुछ युवाओं से बातचीत हुई। किसी ने कहा कि वे केवल कार्यक्रम देखने आए थे। वह उस जेन जी से इत्तेफाक नहीं रखते जो जंतर मंतर पर थे।कुछ का कहना था कि जेन जी हर पक्ष अपने नजरिए से परिभाषित कर रहा है। कुछ का कहना था कि जेन जी के मुद्दों को सही हैं, उसके आचरण और भाषा में मर्यादा होनी चाहिए।
इस प्रश्न का उत्तर एक दिन पहले पूर्व आईएएस अधिकारी एवं भारतीय शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. एन.पी. सिंह ने साक्षात्कार के दौरान अपने अनुसार दिया। जेन जी पर पूछे गए सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि जेन जी को गलत ठहराना ही गलत है। समय के साथ पैदा हुई समस्याएं उसके अपने मुद्दे हैं। भाषा या अभिव्यक्ति में कहीं कमी है तो उसे सुधारा जा सकता है, लेकिन उसे गंभीरता से लेना होगा। जेन जी केवल देश का भविष्य नहीं, वर्तमान भी है।
लेकिन इसके साथ एक महत्वपूर्ण सवाल जेन जी के सामने भी है—क्या आक्रोश व्यक्त कर लेना ही पर्याप्त है? क्या सड़क पर उतरना ही समाधान है? या फिर आक्रोश को रचनात्मक दिशा देकर व्यवस्था और सरकार के सामने कोई व्यवहारिक विकल्प रखना भी उसकी जिम्मेदारी है? सिस्टम को दोष देना आसान है; उसे बदलने के लिए समाधान प्रस्तुत करना कठिन। यही वह बिंदु है जहां आंदोलन और परिवर्तन के बीच अंतर पैदा होता है।
डॉ. एन.पी. सिंह ने एक और महत्वपूर्ण बात कही—यदि आज की जेन जी की भाषा, व्यवहार या दृष्टिकोण में कोई कमी दिखाई देती है, तो उसकी जिम्मेदारी केवल जेन जी की नहीं है। उसे संस्कार और दिशा देने वाली पिछली दो पीढ़ियां—जेन एक्स और जेन वाई—भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। उनका पूरा साक्षात्कार यूट्यूब चैनल @panchayat24news पर देखा जा सकता है।
गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय में आयोजित प्रेरणा विमर्श 2026 कार्यक्रम में हजारों लोग उपस्थित थे और युवाओं की संख्या भी न्दी तादाद में थी। यह याद रखना जरूरी है कि किसी भी राजनीतिक दल द्वारा आयोजित कार्यक्रम में सामान्यतः उसी दल अथवा उसकी विचारधारा से प्रभावित लोगों की भागीदारी अधिक होती है। इसलिए वहां की उपस्थिति को पूरे युवा समाज की प्रतिनिधि आवाज मानना उचित नहीं होगा।
ऐसे में ‘तेरा वाला जेन जी’ ‘मेरा वाला जेन जी’ वाली स्थिति बन रही है। हर राजनीतिक पक्ष उसे अपने विमर्श, अपने मुद्दों और अपने एजेंडे के अनुरूप परिभाषित करना चाहता है। इस राजनीतिक खींचतान में कहीं ऐसा न हो कि जेन जी के वास्तविक सवाल पीछे छूट जाएं। क्योंकि सवाल यह नहीं कि जेन जी किसका समर्थक है? सवाल यह है कि जेन जी के सवाल किसके हैं—और उनके समाधान कौन देगा?




