स्पेशल स्टोरी

लो जी, लंगर ओट लिया! पता चल जाएगा किसमें कितना है दम?

अयोध्या के अखाड़े में यूपी के दो दिग्गजों की ललकार; अब देखना है कि कौन मैदान में उतरता है और कौन चलता है सियासी दांव!

डॉ देवेंद्र कुमार शर्मा

कुश्ती के दंगल में जब कोई पहलवान अपने जोड़ का प्रतिद्वंद्वी न पाकर लंगर फेर देता है, तो अखाड़े की मिट्टी में हलचल मच जाती है। ललकार गूंजती है— है कोई माई का लाल, जो जोर आजमा ले! फिर कोई दूसरा पहलवान उस ललकार को ओट ले, यानी चुनौती स्वीकार कर ले, तो दर्शकों की आंखों में असली कुश्ती देखने की चमक उतर आती है। मगर अखाड़े में उतरना और बाहर खड़े होकर ताल ठोकना—दोनों में बड़ा अंतर है।

उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में इन दिनों कुछ ऐसा ही दंगल सजता दिखाई दे रहा है। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अयोध्या से चुनाव लड़ने की चुनौती दी, तो योगी ने बलरामपुर की सभा में जवाबी ललकार लगा दी—“अखिलेश जी, आप भी अयोध्या से नामांकन करिए और मैं भी। लड़ाई चेलों से क्यों? मुकाबला तो आमने-सामने होना चाहिए।”

लो भैया, अखाड़ा सजाने का न्योता भी आ गया और प्रतिद्वंद्वी को उसी मिट्टी में उतरने की खुली चुनौती भी! अब गांव की चौपाल से लेकर सियासी गलियारों तक एक ही सवाल तैर रहा है—जनता को सचमुच पैसा वसूल मुकाबला देखने को मिलेगा या दोनों पहलवान अपने-अपने खेमे में खड़े होकर ही ताल ठोकते रहेंगे?

चौपाल पर बैठकर पूछिए तो सवाल सीधा है—लंगर किसने फेरा और ओट किसने लिया ? अखिलेश ने योगी को अयोध्या में जोर दिखाने की चुनौती दी; योगी ने पलटकर ऐसा दांव चला कि गेंद सीधे अखिलेश के पाले में जा गिरी। अब सपा मुखिया के सामने सवाल केवल जवाबी बयान देने का नहीं, बल्कि इस चुनौती पर अपना राजनीतिक रुख स्पष्ट करने का भी है।

अखिलेश यदि चुनौती स्वीकार कर अयोध्या से चुनाव लड़ते हैं, तो उनके सामने एक बड़ी चुनौती के साथ राजनीतिक अवसर भी होगा। भाजपा के प्रमुख राजनीतिक प्रतीक वाले क्षेत्र में मुख्यमंत्री को सीधी टक्कर देना अपने आप में बड़ा संदेश होगा। जीत मिली तो सपा इसे भाजपा के लिए मनोवैज्ञानिक झटका और अपनी बड़ी राजनीतिक उपलब्धि के रूप में पेश कर सकती है। मगर यह राह फूलों की सेज नहीं होगी। अयोध्या का धार्मिक-सांस्कृतिक महत्व, भाजपा का संगठन, स्थानीय समीकरण और मतदाताओं का मिजाज—सब इस मुकाबले की दिशा तय करेंगे।

दूसरी ओर, भाजपा के लिए भी अयोध्या महज एक विधानसभा सीट नहीं, बल्कि प्रतीक और प्रतिष्ठा का प्रश्न है। राम मंदिर निर्माण को अपनी राजनीतिक उपलब्धियों में गिनाने वाली भाजपा के लिए यहां संभावित हार का अर्थ सामान्य चुनावी पराजय से कहीं अधिक हो सकता है। ऐसी स्थिति में विरोधियों को हमला बोलने का अवसर मिलेगा। भाजपा भी जीत को अपने नेतृत्व और विकास के पक्ष में जनसमर्थन के रूप में प्रस्तुत करना चाहेगी। मगर यह सब संभावनाओं का गणित है, चुनावी नतीजा नहीं।

दरअसल, 2024 के लोकसभा चुनाव में फैजाबाद संसदीय क्षेत्र से भाजपा को समाजवादी पार्टी के हाथों हार का सामना करना पड़ा था। अयोध्या इसी संसदीय क्षेत्र में स्थित है। राम मंदिर निर्माण के बाद भाजपा को यहां मिली पराजय ने राजनीतिक हलकों में कई सवाल खड़े किए। जिस अयोध्या को भाजपा अपनी आस्था और हिंदुत्व की राजनीति के प्रमुख प्रतीकों में गिनाती रही, वहां का चुनावी नतीजा उसके लिए अप्रत्याशित था। सपा इस परिणाम को सामने रखकर भाजपा के हिंदुत्व संबंधी दावों पर सवाल उठाती रही है।

अखिलेश की चुनौती को इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में देखा जा सकता है। लेकिन योगी ने जिस अंदाज में पलटकर उन्हें अयोध्या से ही चुनाव लड़ने का न्योता दिया, उससे सियासी दंगल का रोमांच बढ़ गया है। संभव है कि अखिलेश ने चुनौती देते समय जवाब में इतने सीधे आमंत्रण की उम्मीद न की हो। अब देखना यह है कि सपा मुखिया इस ललकार को ओटकर अखाड़े में उतरते हैं या कोई दूसरा राजनीतिक दांव चलकर मुकाबले को बयानबाजी की चौहद्दी में ही रहने देते हैं।

हालांकि, राजनीति का दंगल गांव के मेले वाली कुश्ती से कुछ अलग होता है। यहां पहलवानों का जोर ही सब कुछ नहीं होता; संगठन की ताकत, जातीय समीकरण, उम्मीदवारों की रणनीति, स्थानीय मुद्दे और मतदाताओं का भरोसा भी अपने-अपने दांव चलते हैं। चुनौती देना आसान है, उसे स्वीकारना कठिन और स्वीकारने के बाद जीत हासिल करना उससे भी कठिन।

अब सभी की निगाहें अखिलेश यादव पर टिकी हैं। क्या वे योगीआदित्यनाथ द्वारा राजनीतिक अखाड़े में फेरे गए लंगर को ओटकर अखाड़े में उतरेंगे और योगी आदित्यनाथ से सीधे मुकाबले का दम दिखाएंगे, या यह ललकार भी चुनावी मौसम की दूसरी ललकारों की तरह हवा में गूंजकर रह जाएगी? फिलहाल न्योता सामने है, मगर आमने-सामने का मुकाबला तभी माना जाएगा, जब दोनों नेता वास्तव में अयोध्या से चुनाव लड़ने का फैसला करें।

बहरहाल, दंगल में पहलवान चाहे कितना ही नामी-गिरामी क्यों न हो, निर्णायक दांव जनता के हाथ में ही होता है। अखाड़े में तालियां दर्शक बजाते हैं, लेकिन लोकतंत्र में आखिरी पटखनी मतदाता देता है। और जनता का फैसला नारों की गूंज से नहीं, मतपेटी से सामने आता है।

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डॉ देवेंद्र कुमार शर्मा सम्पादक

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