आंदोलनकारियों और सरकार की लड़ाई में कहीं पर निगाहें, कहीं पर निशाना ? ज्ञानेश कुमार विवाद के केंद्र में?

डॉ. देवेंद्र कुमार शर्मा
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार विपक्ष के निशाने पर हैं। एसआईआर को ‘वोट चोरी’ बताते हुए उनके इस्तीफे की मांग की जा रही है। सवाल है—क्या यह मतदाता सूची में सुधार की प्रक्रिया पर उठे वास्तविक सवालों की लड़ाई है या राजनीतिक टकराव का नया मोर्चा? लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन उसका उद्देश्य सुधार होना चाहिए, अराजकता नहीं। जब सत्ता परिवर्तन का संवैधानिक माध्यम चुनाव है, तो सड़कों पर टकराव के बजाय संसद में बहस, तथ्यों के साथ सवाल और बेहतर विकल्प सामने क्यों नहीं रखे जाते?
सरकार के खिलाफ पेपर लीक प्रकरण से शुरू हुए कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के कारण शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का त्यागपत्र हुआ। यह आंदोलन अब अगले चरण में प्रवेश कर चुका है। एसआईआर प्रक्रिया में काटे गए अवैध मतों को ‘वोट चोरी’ का नाम देकर सरकार की घेराबंदी की जा रही है और निशाने पर हैं मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार। वैसे यह पहला मौका नहीं है जब मुख्य चुनाव आयुक्त बनने के बाद उन्हें और उनके परिवार के सदस्यों को सरकार विरोधियों ने निशाने पर लिया है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सरकार ने गलत व्यक्ति को मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में महत्वपूर्ण संवैधानिक पद पर बैठा दिया है या फिर मामला कुछ और ही है?
ज्ञानेश कुमार ने एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी के रूप में अपने 37 वर्षों से अधिक के सेवाकाल में राज्य और केंद्र, दोनों स्तरों पर विभिन्न सरकारों के तहत काम किया। वह मूल रूप से आगरा के रहने वाले हैं और उन्होंने आईआईटी कानपुर से सिविल इंजीनियरिंग में बीटेक की पढ़ाई की है। उन्होंने आईसीएफएआई (इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड फाइनेंशियल एनालिस्ट्स ऑफ इंडिया) से बिजनेस फाइनेंस और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से एनवायरनमेंटल इकोनॉमिक्स की पढ़ाई की है। वह 1988 बैच के केरल कैडर के भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) अधिकारी रहे हैं। केरल राज्य में विभिन्न मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल के दौरान उन्होंने कोच्चि के नगर आयुक्त, एर्नाकुलम के जिला कलेक्टर तथा वित्त, लोक निर्माण और खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभागों के सचिव के रूप में काम किया।
केरल के कोच्चि के पास स्थित गौश्री द्वीपों को मुख्य भूमि से जोड़ने और उनके विकास के लिए गठित गौश्री द्वीप विकास प्राधिकरण में उन्होंने सचिव के रूप में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस परियोजना को लेकर जनता में अविश्वास घर कर चुका था और कई तरह की भ्रांतियां फैली हुई थीं। यह परियोजना मूल रूप से महान समाज सुधारक सहोदरन अय्यप्पन द्वारा परिकल्पित की गई थी, लेकिन प्रशासनिक उपेक्षा और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण यह लगभग 25 से 30 वर्षों तक केवल कागजों पर अटकी रही। लोगों के मन में यह धारणा बैठ चुकी थी कि सरकारें सिर्फ वादे करती हैं और इन द्वीपों को मुख्य भूमि कोच्चि से जोड़ने वाले पुल कभी हकीकत नहीं बन सकते। जनता इस परियोजना को एक राजनीतिक छलावा मान चुकी थी।
ज्ञानेश कुमार ने केंद्र में प्रतिनियुक्ति के दौरान मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार में रक्षा मंत्रालय में संयुक्त सचिव के रूप में और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में गृह मंत्रालय, संसदीय कार्य मंत्रालय तथा सहकारिता मंत्रालय में महत्वपूर्ण पदों पर काम किया। उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव (कश्मीर डिवीजन) के पद पर रहते हुए अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने और राज्य के पुनर्गठन से जुड़े कानूनी मसौदे को तैयार करने में अत्यंत गोपनीय और महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद गृह मंत्रालय में रहते हुए उन्होंने राम मंदिर निर्माण की देखरेख के लिए ट्रस्ट के गठन से जुड़ी प्रशासनिक प्रक्रियाओं को भी संभाला। वह देश के नवनिर्मित सहकारिता मंत्रालय के सचिव रहे। उनके कार्यकाल में ‘मल्टी-स्टेट कोऑपरेटिव सोसाइटीज संशोधन अधिनियम, 2023’ पारित हुआ। रक्षा मंत्रालय में संयुक्त सचिव के तौर पर उन्होंने देश के सभी डिफेंस शिपयार्ड के आधुनिकीकरण में अहम भूमिका निभाई। ज्ञानेश कुमार 31 जनवरी 2024 को भारतीय प्रशासनिक सेवा से सेवानिवृत्त हुए और उन्हें 14 मार्च 2024 को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया। 19 फरवरी 2025 को उन्हें भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त का पदभार सौंपा गया। वह नए चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 के तहत नियुक्त होने वाले पहले मुख्य चुनाव आयुक्त हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में उन्होंने वर्ष 2026 के लिए लोकतांत्रिक और चुनावी सहायता के अंतरराष्ट्रीय संस्थान के काउंसिल ऑफ मेंबर स्टेट्स की अध्यक्षता भी संभाली है।
वह केरल के सबसे महत्वपूर्ण जिलों में से एक एर्नाकुलम के जिला कलेक्टर रहे थे। जिला कलेक्टर के रूप में उनके कार्यों को राज्य स्तर पर सर्वश्रेष्ठ प्रशासनिक कार्यों में गिना जाता है। इसके अलावा, 2003 में कोच्चि में आयोजित विशाल अंतरराष्ट्रीय वीवीआईपी आयोजन ‘अमृतवर्षम’ के दौरान उनके द्वारा किए गए बेहतरीन भीड़ प्रबंधन और आपातकालीन स्वास्थ्य प्रबंधन के लिए केरल सरकार ने उन्हें विशेष रूप से सम्मानित किया था। नवंबर 2025 में उनके उच्च स्तरीय नीतिगत बदलावों, प्रशासनिक विशेषज्ञता और चुनावी प्रशासन में शानदार योगदान के लिए उनके मातृ संस्थान आईआईटी कानपुर ने उन्हें अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान से सम्मानित किया।
यह पृष्ठभूमि उनके अनुभव और प्रशासनिक क्षमता का परिचय देती है। फिर भी, किसी पदाधिकारी की योग्यता का अर्थ यह नहीं कि उसके निर्णय सवालों से परे हैं। उसी तरह, किसी निर्णय से असहमति अपने आप में उसे गलत या किसी अधिकारी को दोषी साबित नहीं करती। एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) का घोषित उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाना है। मृत मतदाताओं, स्थानांतरित लोगों और दोहरी प्रविष्टियों की पहचान जरूरी है, लेकिन किसी पात्र नागरिक का नाम गलती से भी नहीं हटना चाहिए। यदि किसी का नाम मतदाता सूची से कट गया है, तो वह निर्धारित प्रक्रिया का पालन कर दोबारा नाम जुड़वा सकता है। इसका प्रावधान एसआईआर में किया गया है।
विपक्ष को आरोप लगाने का अधिकार है, लेकिन आरोपों के समर्थन में प्रमाण और ठोस तथ्य भी प्रस्तुत करने चाहिए। चुनाव आयोग को नाम जोड़ने की प्रक्रिया इतनी सरल बनानी चाहिए कि आम नागरिक को अपने मताधिकार के लिए अनावश्यक संघर्ष न करना पड़े। भारत ने चुनावी व्यवस्था में कई दौर देखे हैं—बूथ कैप्चरिंग, फर्जी मतदान और मतपत्र लूटने जैसी घटनाओं से लेकर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों तक का बदलाव। सुधारों की यात्रा निरंतर चलनी चाहिए। एसआईआर भी इसी प्रक्रिया का एक हिस्सा है। किसी नई प्रक्रिया को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि उससे राजनीतिक विवाद पैदा हुआ है, लेकिन उसे निष्पक्षता, पारदर्शिता और मतदाता के अधिकारों की कसौटी पर परखा जाना चाहिए।
इस बीच अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य भी चुनौतीपूर्ण है। अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप का बदलता रुख और बदलते वैश्विक समीकरण। पाकिस्तान तथा चीन से जुड़ी सुरक्षा चुनौतियां भारत के सामने हैं। बांग्लादेश में राजनीतिक बदलाव के बाद भारत के साथ संबंधों में आई तल्खी भी चिंता का विषय है। ऐसे समय में देश के भीतर राजनीतिक संघर्ष और संवैधानिक संस्थाओं पर अविश्वास के सवाल और संवेदनशील हो जाते हैं। क्या कोई विदेशी शक्ति भारत को कमजोर करना चाहती है? क्या उसे देश के भीतर की राजनीतिक खींचतान से लाभ मिल सकता है? दुनिया के कई देश अराजकता के इस दौर से गुजर चुके हैं, कुछ अभी गुजर रहे हैं और कुछ का नाम भविष्य में इस सूची में शामिल हो सकता है। भारत के पड़ोसी इसके परिणाम भुगत रहे हैं। ऐसे में यह मान लेना कि भारत में ऐसा नहीं हो सकता, नासमझी ही कहलाएगी।
ऐसे में ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग हो या एसआईआर का विरोध—दोनों का फैसला न नारों से होना चाहिए, न राजनीतिक दबाव से। लोकतंत्र में अधिकारी जवाबदेह हों, विपक्ष प्रमाणों के साथ सवाल उठाए और सरकार नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करे। देशहित का अर्थ सरकार से असहमति छोड़ देना नहीं, बल्कि असहमति को संवैधानिक मर्यादा, तथ्य और संवाद के दायरे में रखना है।
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डॉ देवेंद्र कुमार शर्मा,
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