गाज़ियाबाद

संस्कार, शिक्षा और समाज : खोड़ा की घटना से उठते गंभीर सवाल

Panchayat 24 (गाजियाबाद) : खोड़ा क्षेत्र में ईद के दिन हुई एक दर्दनाक घटना ने केवल कानून-व्यवस्था ही नहीं, बल्कि समाज, परिवार और शिक्षा व्यवस्था को लेकर भी कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। नवनीत विहार कॉलोनी में 11वीं कक्षा के छात्र सूर्या चौहान की चाकू मारकर हत्या कर दी गई। आरोप है कि यह हमला उसके परिचित असद और उसके साथियों ने किया। घटना की क्रूरता ने पूरे इलाके को झकझोर दिया।

बताया गया कि पेट में चाकू लगने के बाद भी सूर्या करीब 200 मीटर तक अपनी जान बचाने के लिए भागता रहा, लेकिन आरोपियों ने उसका पीछा कर दोबारा हमला किया। उपचार के दौरान उसकी मृत्यु हो गई। यह घटना केवल एक हत्या नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता की भयावह तस्वीर भी प्रस्तुत करती है, जो समाज के भीतर धीरे-धीरे पनप रही है। सवाल यह नहीं है कि आरोपी कौन था या उसका धर्म क्या था ? असली सवाल यह है कि आखिर एक किशोर के भीतर इतनी हिंसक सोच आई कहां से? एक बच्चा कैसे इस स्तर तक पहुंच जाता है कि वह किसी की जान लेने को सामान्य मानने लगे?

किसी भी समाज की बुनियाद उसके संस्कार होते हैं। संस्कार ही मनुष्य को सही और गलत के बीच अंतर करना सिखाते हैं। बच्चे जन्म से अपराधी नहीं होते। उनका व्यवहार, उनकी सोच और उनका दृष्टिकोण उस वातावरण से निर्मित होता है जिसमें वे पलते-बढ़ते हैं। परिवार बच्चे की पहली पाठशाला होता है। यहीं से वह व्यवहार, भाषा, संवेदनशीलता और मानवता सीखता है। इसके बाद शिक्षण संस्थान उसकी सोच को दिशा देते हैं। स्कूल केवल किताबों का ज्ञान नहीं देते, बल्कि सामाजिक नैतिकता, अनुशासन और सह-अस्तित्व की भावना भी विकसित करते हैं।

यही कारण है कि जब परिवार और शिक्षण संस्थानों के संस्कारों में बड़ा अंतर आ जाता है, तब समाज में वैचारिक टकराव पैदा होने लगता है। यदि किसी बच्चे को बचपन से यह सिखाया जाए कि उसका धर्म, उसकी विचारधारा या उसकी पहचान दूसरों से श्रेष्ठ है, तो उसके भीतर धीरे-धीरे कट्टरता जन्म लेने लगती है। यह कट्टरता आगे चलकर असहिष्णुता और हिंसा का रूप ले सकती है।

आज समाज में यह बहस लगातार गहराती जा रही है कि क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था बच्चों को एक समान मानवीय मूल्य दे पा रही है? क्या सभी शिक्षण संस्थानों में सही और गलत के नैतिक पैमाने एक जैसे हैं? यह सच है कि अधिकांश सामान्य स्कूलों में विविधता और सह-अस्तित्व की भावना पर बल दिया जाता है, लेकिन जब शिक्षा का आधार केवल धार्मिक पहचान तक सीमित हो जाता है, तब कई बार बच्चों में दूसरे समुदायों के प्रति दूरी और श्रेष्ठता की भावना विकसित होने लगती है।

धार्मिक शिक्षा अपने आप में गलत नहीं है। हर धर्म प्रेम, दया और मानवता का संदेश देता है। समस्या तब पैदा होती है जब धार्मिक शिक्षा संतुलित सामाजिक शिक्षा की जगह लेने लगती है और बच्चों को व्यापक मानवीय दृष्टिकोण नहीं मिल पाता। कम उम्र में यदि बच्चों के मन में “हम श्रेष्ठ ” और “दूसरे निम्न और हीन ” की दीवारें खड़ी होने लगें, तो आगे चलकर वही मानसिकता समाज के लिए खतरा बन जाती है।

इसी संदर्भ में एक महत्वपूर्ण सुझाव पर गंभीर राष्ट्रीय बहस की आवश्यकता महसूस होती है—क्या नाबालिग बच्चों के लिए संस्थागत धार्मिक शिक्षा पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए? धर्म मूलतः व्यक्ति की निजी आस्था और आध्यात्मिक विश्वास का विषय है। लेकिन जब छोटी उम्र के बच्चों को संगठित संस्थानों के माध्यम से धार्मिक विचारधाराओं के भीतर ढाला जाता है, तब वे अक्सर बिना तर्क, बिना प्रश्न और बिना वैचारिक स्वतंत्रता के उन मान्यताओं को स्वीकार कर लेते हैं।

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी नाबालिग अवस्था वह समय होती है जब बच्चे में स्वतंत्र तर्क-वितर्क, आलोचनात्मक सोच और जटिल सामाजिक प्रश्नों को समझने की क्षमता पूरी तरह विकसित नहीं होती। वह जो सुनता है, वही सत्य मान लेता है। बाद में जब वह तार्किक सोच विकसित करने की स्थिति में पहुंचता है, तब तक अनेक धार्मिक मान्यताएं उसके व्यक्तित्व का स्थायी हिस्सा बन चुकी होती हैं। ऐसी स्थिति में वह उन मान्यताओं की समीक्षा या संशोधन के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं हो पाता। यही कारण है कि कई बार कट्टरता बचपन में बोए गए वैचारिक बीजों से विकसित होती है।

इसलिए यह विचार सामने आता है कि नाबालिगों को संस्थागत धार्मिक शिक्षा से दूर रखा जाए और उन्हें पहले सार्वभौमिक मानवीय मूल्य, वैज्ञानिक सोच, संवैधानिक आदर्श, सहिष्णुता और सामाजिक समरसता की शिक्षा दी जाए। धार्मिक ज्ञान यदि देना हो तो वह पारिवारिक संस्कारों और निजी आस्था के दायरे में सीमित रह सकता है, जहां माता-पिता बच्चे को अपने सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं से परिचित कराएं, लेकिन उसे दूसरे विचारों के प्रति घृणा या श्रेष्ठता की भावना न सिखाई जाए।

यह प्रस्ताव निश्चित रूप से बहस का विषय हो सकता है और इसके पक्ष-विपक्ष में तर्क भी मौजूद हैं। कुछ लोग इसे धार्मिक स्वतंत्रता से जोड़कर देखेंगे, जबकि कुछ इसे सामाजिक सौहार्द और वैज्ञानिक सोच के लिए आवश्यक मानेंगे। लेकिन इतना स्पष्ट है कि यदि समाज को भविष्य में कट्टरता, हिंसा और वैचारिक असहिष्णुता से बचाना है, तो बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा और मानसिक निर्माण पर गंभीरता से विचार करना ही होगा।

खोड़ा की घटना में जिस तरह कुछ युवक यह कहते हुए एक नाबालिग को छुरा घोपकर मौत के घाट उतर देते है कि आज तुम्हे बताते हैं कि बकरा कैसे हलाल किया जाता है? उसने लोगों को भीतर तक विचलित किया है। यह केवल आपराधिक मानसिकता का मामला नहीं लगता, बल्कि यह उस संवेदनहीन सोच की ओर भी संकेत करता है, जिसमें हिंसा को सामान्य बनाने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। किसी किशोर के मन में ऐसी सोच का विकसित होना समाज के लिए चेतावनी है।

हालांकि यह भी उतना ही आवश्यक है कि किसी एक अपराध के आधार पर पूरे समुदाय, धर्म या किसी विशेष वर्ग को कटघरे में खड़ा न किया जाए। अपराधी की पहचान केवल अपराधी की होनी चाहिए। लेकिन समाज को यह आत्ममंथन अवश्य करना होगा कि आखिर हमारे बच्चों के भीतर मानवीय संवेदनाएं कमजोर क्यों पड़ रही हैं? क्यों छोटी-छोटी बातों पर हिंसा सामान्य होती जा रही है? क्यों सहनशीलता और संवाद की जगह आक्रामकता बढ़ रही है?

इस समस्या का समाधान केवल पुलिस कार्रवाई या कठोर कानूनों से संभव नहीं है। जरूरत है कि परिवार बच्चों को बचपन से संवेदनशीलता, सहिष्णुता और मानवता के संस्कार दें। शिक्षण संस्थान भी ऐसी शिक्षा दें जो बच्चों को बेहतर इंसान बनाए, केवल परीक्षा पास करने वाली मशीन नहीं। स्कूलों और अन्य शिक्षण संस्थानों में नैतिक शिक्षा, संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक समरसता को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए। एक समान शिक्षा नीति के तहत छात्र शिक्षा प्राप्त करें।

देश का भविष्य केवल तकनीकी रूप से सक्षम युवाओं से सुरक्षित नहीं होगा, बल्कि ऐसे नागरिकों से होगा जिनके भीतर मानवता, करुणा और दूसरों के प्रति सम्मान की भावना हो। यदि संस्कारों और शिक्षा की दिशा सही नहीं रही, तो समाज में वैचारिक कट्टरता और हिंसा का खतरा लगातार बढ़ता जाएगा।

खोड़ा की यह घटना केवल एक परिवार का दर्द नहीं है, बल्कि पूरे समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी है। अब यह तय समाज और सरकारों को करना है कि वह आने वाली पीढ़ी को नफरत और कट्टरता की राह पर जाने देगा या उन्हें संवेदनशील, जिम्मेदार और मानवीय नागरिक बनाने की दिशा में गंभीर प्रयास करेगा।

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