मेरठ-सहारनपुर विधान परिषद चुनाव: किसी के हिस्से जीत, किसी के हाथ अनुभव; नफरत की राजनीति को क्या मिला?

डॉ देवेंद्र कुमार शर्मा
मतदाताओं ने परिणामों से दिया संदेश—प्रतिनिधि का मूल्यांकन व्यक्तिगत आक्षेपों से नहीं, कर्म, व्यवहार और जनहित में किए गए कार्यों से होता है
उत्तर प्रदेश के मेरठ-सहारनपुर खंड के शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के विधान परिषद चुनाव परिणामों ने भाजपा को दोहरी सफलता दिलाई। भाजपा के दोनों प्रत्याशियों ने न केवल अपनी सीटें बरकरार रखीं, बल्कि अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वियों को भी उल्लेखनीय अंतर से पराजित किया। मंगलवार शाम घोषित परिणामों में स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से दिनेश गोयल और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से श्रीचंद शर्मा ने पुनः विजय प्राप्त कर अपने राजनीतिक प्रभाव और मतदाताओं के बीच स्वीकार्यता को प्रमाणित किया।
स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में दिनेश गोयल को 24,928 मत प्राप्त हुए। उन्होंने समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी प्रमेन्द्र भाटी को 12,688 मतों से पराजित किया। वहीं, शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा के श्रीचंद शर्मा को 18,099 मत मिले और उन्होंने समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी नितिन तोमर को 13,241 मतों से शिकस्त दी। दोनों सीटों पर भाजपा की पुनर्विजय ने यह स्पष्ट कर दिया कि चुनावी राजनीति में दावों, नारों और आरोपों से कहीं अधिक महत्त्व मतदाताओं के विश्वास का है।
कर्म की कसौटी पर उम्मीदवार
श्रीचंद शर्मा की पुनर्विजय के पीछे उनके कार्यकाल, शिक्षकों के हितों से जुड़े प्रयासों और व्यक्तिगत व्यवहार की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पार्टी द्वारा प्रत्याशी घोषित किए जाने के बाद से ही उनके समर्थन में शिक्षक समुदाय और भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच सकारात्मक माहौल दिखाई देने लगा था। यह समर्थन केवल राजनीतिक निष्ठा का परिणाम था अथवा उनके कार्यों के प्रति संतोष का, इसका अंतिम निर्णय मतदाताओं ने अपने मताधिकार के माध्यम से दिया।
लोकतंत्र में जनादेश सर्वोपरि होता है। मतपेटियों से निकला निर्णय किसी प्रत्याशी की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा भर का प्रश्न नहीं, बल्कि मतदाताओं की सामूहिक अभिव्यक्ति होता है। इसलिए चुनाव परिणामों को केवल जीत और हार के गणित तक सीमित करके देखना उचित नहीं। उनके भीतर जनविश्वास, कार्यशैली, सामाजिक स्वीकार्यता और राजनीतिक आचरण से जुड़े अनेक संकेत भी निहित होते हैं।
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव लड़ना प्रत्येक पात्र नागरिक का अधिकार है। मतभेद होना स्वाभाविक है, प्रतिस्पर्धा अपरिहार्य है और आलोचना लोकतंत्र की प्राणवायु है। किंतु इस समूची प्रक्रिया की गरिमा तब बनी रहती है, जब राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता व्यक्तिगत वैमनस्य में परिवर्तित न हो और विचारों का संघर्ष व्यक्ति के अपमान का माध्यम न बने।
विरोध कीजिए, अपमान नहीं
इस चुनाव के दौरान श्रीचंद शर्मा को लेकर हुई कुछ टिप्पणियों ने राजनीतिक विरोध की मर्यादा पर प्रश्नचिह्न खड़े किए। उनकी जातीय पहचान और चोटी जैसी धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान को निशाना बनाकर की गई टिप्पणियां स्वस्थ लोकतांत्रिक विमर्श की कसौटी पर उचित नहीं ठहराई जा सकतीं। जब विरोध नीतियों, निर्णयों और कार्यों से हटकर किसी व्यक्ति की शारीरिक, धार्मिक अथवा सांस्कृतिक पहचान पर केंद्रित हो जाता है, तब वह आलोचना की सीमा लांघकर व्यक्तिगत अवमानना का रूप लेने लगता है।
स्थिति ऐसी बनी कि धीर गंभीर स्वभाव वाले श्रीचंद शर्मा को भी सोशल मीडिया के माध्यम से विरोधियों को मर्यादित भाषा में अपनी बात रखने की नसीहत देनी पड़ी। यह प्रसंग केवल एक प्रत्याशी के पक्ष-विपक्ष का विषय नहीं है; यह उस राजनीतिक संस्कृति पर विचार करने का अवसर है, जिसमें असहमति को तर्क से नहीं, बल्कि उपहास और आक्षेपों से परास्त करने का प्रयास किया जाता है।
राजनीति में कटुता के लिए स्थान हो सकता है, किंतु कटुता ही राजनीति का चरित्र बन जाए, यह किसी भी समाज के लिए शुभ संकेत नहीं। लोकतंत्र की सुंदरता इस बात में नहीं कि सभी एक-दूसरे से सहमत हों, बल्कि इसमें है कि असहमति के बावजूद परस्पर सम्मान और संवाद की संभावना बनी रहे। प्रतिद्वंद्वी को पराजित करने की आकांक्षा स्वाभाविक है, परंतु उसकी गरिमा को धूमिल करने की चेष्टा अंततः स्वयं राजनीतिक संस्कारों को ही कठघरे में खड़ा करती है।
बयानवीरों से अधिक भरोसा कर्मवीरों पर
चुनाव परिणामों का एक महत्त्वपूर्ण संदेश यह भी है कि मतदाता केवल वाक्पटुता और आक्रामक बयानबाजी से प्रभावित नहीं होते। वे अपने प्रतिनिधि के कार्यों, व्यवहार, उपलब्धता और अपने हितों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता का भी मूल्यांकन करते हैं। लोकतंत्र में शब्दों का अपना महत्त्व है, लेकिन जब शब्दों और कर्मों के बीच दूरी बढ़ने लगती है, तब मतदाता अपने विवेक से उस अंतर को रेखांकित कर देते हैं।
जीत को आत्ममुग्धता का कारण बनाने के बजाय आत्ममंथन का अवसर मानना चाहिए। इसी प्रकार, पराजय को केवल प्रतिकूल परिस्थितियों या विरोधियों की रणनीति के खाते में डाल देना राजनीतिक विवेक का परिचायक नहीं है। हार का वास्तविक लाभ तभी मिलता है, जब गलतियों के अनुभव से सीखा जाए।
जीतने वालों को जिम्मेदारी, हारने वालों को अनुभव
प्रमेन्द्र भाटी द्वारा अपनी पराजय स्वीकार करना लोकतांत्रिक परिपक्वता का सकारात्मक उदाहरण है। चुनाव में विजय जितनी महत्त्वपूर्ण है, उतना ही महत्त्वपूर्ण पराजय के जनादेश का सम्मान करना भी है। परिणाम को स्वीकार करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति आस्था का परिचायक है और यही आस्था राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को स्वस्थ बनाए रखती है।
अब भाजपा के विजयी प्रत्याशियों के सामने अपनी उपलब्धियों को आगे बढ़ाने, मतदाताओं की अपेक्षाओं को समझने और शिक्षक तथा स्नातक समुदाय से जुड़े प्रश्नों पर निरंतर सक्रिय रहने की चुनौती है। दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी सहित पराजित पक्षों के लिए यह समय आत्मविश्लेषण का है। उन्हें यह देखना होगा कि संगठनात्मक तैयारी, प्रत्याशी चयन, मतदाताओं तक पहुंच और चुनावी संवाद के किन पक्षों में सुधार की आवश्यकता है।
आगामी विधानसभा चुनावों के संदर्भ में भी इन परिणामों को राजनीतिक दलों के लिए एक संकेत के रूप में देखा जा सकता है, हालांकि विधान परिषद के शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों का जनादेश सीधे विधानसभा चुनावों के परिणामों का पूर्वानुमान नहीं माना जा सकता। दोनों चुनावों का मतदाता आधार, मुद्दे और राजनीतिक परिस्थितियां अलग-अलग होती हैं। फिर भी, जनविश्वास अर्जित करने, संगठन को सक्रिय रखने और विरोधियों के प्रति मर्यादित आचरण बनाए रखने की आवश्यकता सभी चुनावों में समान रूप से प्रासंगिक रहती है।
अंततः, चुनावी राजनीति का सार केवल जीतने और हारने में नहीं, बल्कि उससे मिलने वाले सबक में निहित है। विजेता को जनादेश के साथ जिम्मेदारी मिलती है और पराजित प्रत्याशी को अपनी रणनीति सुधारने का अनुभव। आरोप-प्रत्यारोप राजनीति का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन वे न तो विकास का विकल्प हैं और न ही जनविश्वास अर्जित करने का स्थायी साधन।
मेरठ-सहारनपुर के इन चुनाव परिणामों को इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए। जीतने वालों को शुभकामनाएं और पराजित प्रत्याशियों को भविष्य के लिए मंगलकामनाएं। लोकतंत्र तभी सशक्त होगा, जब विजय में विनम्रता, पराजय में धैर्य और विरोध में मर्यादा बनी रहेगी।




