नोएडा विधानसभा

भक्ति रंग में रंगा नोएडा : जब स्वर बने साधना और कीर्तन बना ईश्वर से साक्षात्कार का सेतु

Panchayat 24 (नोएडा) : नोएडा में भक्ति, संगीत और ध्यान का अद्भुत और दिव्य संगम उस समय साकार हो उठा, जब योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया (YSS) के नोएडा स्थित आश्रम में आयोजित भक्ति‍मय कीर्तन संध्या ने हजारों श्रद्धालुओं के हृदयों को एक दिव्य अनुभूति में बांध दिया। यह केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि आत्मा से परमात्मा तक की यात्रा का जीवंत अनुभव बन गया। हर स्वर में ईश्वर की अनुभूति झलक रही थी।

यह पावन अवसर उस ऐतिहासिक क्षण का प्रतीक बना, जब परमहंस योगानन्द ने 18 अप्रैल 1926 को न्यूयॉर्क के कार्नेगी हॉल में पहली बार पश्चिमी जगत को भक्ति‍मय कीर्तन से परिचित कराया था। उस दिन की गूंज जैसे आज भी जीवित हो—”ओ गॉड ब्यूटीफुल” के दिव्य स्वर मानो पुनः अंतरिक्ष में प्रतिध्वनित हो उठे।

कार्यक्रम का शुभारंभ स्वामी स्मरणानन्द और स्वामी अद्यानन्द के प्रेरणादायक उद्बोधनों से हुआ। उन्होंने भक्ति को केवल भावना नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक साधना बताते हुए कहा कि जब संगीत आत्मा की गहराइयों से उठता है, तब वह सीधे ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग बन जाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भक्ति‍मय कीर्तन मन को एकाग्र कर उसे अंतर्मुखी बनाता है—जहां साधक बाहरी संसार से हटकर अपने भीतर के दिव्य स्वरूप से जुड़ता है। यह साधना भय, चिंता और अशांति को हरकर शांति, प्रेम और आत्मिक संतुलन का संचार करती है।

संध्या का चरम क्षण तब आया जब ब्रह्मचारी भास्करानन्द के नेतृत्व में संन्यासियों ने सामूहिक कीर्तन आरंभ किया। “ओ गॉड ब्यूटीफुल” से शुरू हुआ यह आध्यात्मिक प्रवाह अंग्रेज़ी और हिन्दी के कॉस्मिक चैंट्स के साथ आगे बढ़ता गया। हर लय, हर स्वर और हर विराम मानो आत्मा को ईश्वर के और निकट ले जा रहा था। जब हजारों कंठ एक साथ गूंजे, तो वातावरण केवल संगीत से नहीं, बल्कि भक्ति की दिव्य ऊर्जा से भर उठा। अनेक श्रद्धालुओं ने गहन शांति, भावनात्मक मुक्ति और आत्मिक उत्थान का अनुभव किया—मानो समय ठहर गया हो और केवल ईश्वर का सान्निध्य शेष रह गया हो।

स्वामी स्मरणानन्दजी ने कहा कि सच्चा कीर्तन शब्दों और ध्वनियों से परे होता है—यह हृदय की वह पुकार है जो सीधे परमात्मा तक पहुंचती है। जब भक्ति अपनी चरम अवस्था में पहुंचती है, तब साधक और साध्य के बीच का भेद मिट जाता है।कार्यक्रम के अंत में स्वामी अद्यानन्दजी ने सभी को YSS की शिक्षाओं—विशेषकर राजयोग के मार्ग—को अपनाने के लिए प्रेरित किया, जो भक्ति, ध्यान और संतुलित जीवन का समन्वय है।

यह आयोजन केवल नोएडा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वैश्विक स्तर पर उसी दिन कार्नेगी हॉल में आयोजित समानांतर कार्यक्रम के साथ पूरी दुनिया को एक आध्यात्मिक सूत्र में पिरोता रहा—जहां भाषा, संस्कृति और सीमाओं से परे केवल भक्ति का एक ही स्वर गूंज रहा था। अंततः, इस दिव्य संध्या ने यह संदेश हृदयों में अंकित कर दिया

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