ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण

बोड़ाकी रेलवे प्रोजेक्ट: 1365 परिवार राजी, आखिर किसने जोड़े भरोसे के तार?

Panchayat 24 (ग्रेटर नोएडा) : दिल्ली में लगातार बढ़ते रेल यातायात के दबाव को कम करने के लिए ग्रेटर नोएडा के बोड़ाकी रेलवे स्टेशन को दिल्ली के आनंद विहार रेलवे टर्मिनल के विकल्प के रूप में विकसित करने की योजना बनाई गई है। प्रस्ताव के अनुसार यहां 13 रेलवे स्टेशन तैयार किए जाएंगे और 63 रेलवे लाइनें बिछाई जाएंगी।

इस परियोजना का सबसे संवेदनशील पहलू है—विस्थापन। इसके लिए सात गांव—चमरावली बोड़ाकी, पल्ला, कठेहरा, दादरी, पाली, तिलपता कनारवास और चमरावली रामगढ़—के 1365 परिवारों को हटाया जाएगा। प्रभावित परिवारों को शिव नादर विश्वविद्यालय के पीछे, दतावली गांव के उत्तर में अंसल प्रोजेक्ट के पास बसाने की योजना है। उन्हें जमीन के बदले जमीन और मकान निर्माण की लागत भी दी जाएगी।

सबसे अहम बात यह है कि अधिकांश प्रभावित लोग इस प्रस्ताव से सहमत हैं। यही इस पूरी प्रक्रिया को खास बनाता है। स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि जब किसान अपनी जमीन देने को तैयार नहीं थे, तो लोग अपने घर छोड़ने को कैसे राजी हो गए? जब रेलवे परियोजनाओं में पुनर्वास का स्पष्ट प्रावधान नहीं होता, तो यहां यह सहमति कैसे बनी? सरकार, प्राधिकरण और जनता के बीच सेतु कौन बना?

करीब एक वर्ष पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ नेता और भाजपा के विधान परिषद सदस्य नरेंद्र भाटी से हुई मुलाकात इस सवाल का एक अहम संकेत देती है। उस समय उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं था, लेकिन बातचीत में उनका बेबाक अंदाज कायम था। जब उनसे बोड़ाकी रेलवे स्टेशन विस्तार और संभावित विस्थापन पर सवाल किया गया, तो पहली नजर में लगा कि शायद वह इस संवेदनशील मुद्दे से दूरी बनाए हुए हैं। आमतौर पर नेता ऐसे मामलों में कम ही सक्रिय दिखते हैं, जहां श्रेय से ज्यादा आलोचना और मिलती है।

लेकिन बातचीत आगे बढ़ी तो तस्वीर साफ होने लगी। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ एक परियोजना नहीं, बल्कि उनके “अठगइया” परिवार के अस्तित्व का सवाल है। पाली, पल्ला, बोड़ाकी, दतावली, कठेहड़ा, बील, नई बस्ती और चिटेहरा को उन्होंने अपना परिवार बताते हुए कहा कि यहां होने वाली कोई भी घटना उन्हें व्यक्तिगत रूप से प्रभावित करती है।

उन्होंने यह भी माना कि बोड़ाकी रेलवे स्टेशन का विस्तार एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय परियोजना है, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में लोगों को विस्थापन के लिए तैयार करना आसान नहीं है। यह एक जटिल और संवेदनशील विषय है। इसके बावजूद उन्होंने इस मुद्दे से दूरी बनाने से इनकार किया।

उन्होंने बताया कि वह लगातार गांवों में जाकर लोगों से संवाद कर रहे हैं और उनकी भावनाओं को समझने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि मौजूदा हालात में लोग न तो विस्थापन के लिए तैयार हैं और न ही मौजूदा मुआवजा दर से संतुष्ट हैं। उन्होंने आश्वासन दिया कि वह प्रभावित परिवारों को उचित पुनर्वास दिलाने के लिए प्रयास करेंगे, जिसमें आबादी की जमीन और मकान निर्माण की लागत शामिल होगी।

उन्होंने अंसल प्रोजेक्ट और शिव नादर विश्वविद्यालय के आसपास की जमीन को पुनर्वास के लिए उपयोग करने का सुझाव भी दिया। साथ ही, उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्राधिकरण से मुआवजा दर बढ़ाने के लिए बात करने की बात कही। उस समय उनकी बातों पर पूरी तरह विश्वास करना आसान नहीं था। हालांकि, समय-समय पर उनकी मुख्यमंत्री से मुलाकात की खबरें सामने आती रहीं, जिन्हें सामान्य राजनीतिक गतिविधि माना गया।

बीते एक अप्रैल को ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण के सीईओ एन. जी. रवि कुमार ने जो प्रसन्न मुद्रा में जो बातें बताई उससे स्पष्ट हो गया कि इस पूरी प्रक्रिया में नरेंद्र सिंह भाटी ने स्थानीय लोगों, प्राधिकरण, रेलवे और सरकार के बीच एक मजबूत सेतु की भूमिका निभाई है। यह भी स्पष्ट हुआ कि प्राधिकरण का रुख किसानों और प्रभावित लोगों के प्रति सकारात्मक रहा है। सीईओ मुआवजा दर बढ़ाने के पक्षधर रहे हैं, जिससे इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में मदद मिली। प्राधिकरण और नेतृत्व के इस समन्वय ने एक जटिल मुद्दे को सहमति में बदलने का काम किया।

आज स्थिति यह है कि अधिकांश प्रभावित परिवार पुनर्वास के प्रस्ताव से सहमत हैं। यह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि आमतौर पर ऐसे मामलों में विरोध और टकराव अधिक देखने को मिलता है। यदि यह परियोजना तय योजना के अनुसार सफलतापूर्वक पूरी होती है, तो इसका श्रेय सिर्फ सरकार और प्राधिकरण को ही नहीं, बल्कि उस नेतृत्व को भी जाएगा जिसने जमीन पर विश्वास कायम किया और संवाद के माध्यम से समाधान निकाला।

एक जनप्रतिनिधि होने के साथ-साथ “अठगइया” परिवार के सदस्य के रूप में नरेंद्र सिंह भाटी ने जिस तरह अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन किया है, वह उन्हें इस पूरी प्रक्रिया में एक सशक्त नायक के रूप में स्थापित करता है जो आगे बढ़कर चुनौतियों को स्वीकार करता है। यह कहानी सिर्फ एक रेलवे परियोजना की नहीं, बल्कि संवाद, विश्वास और जिम्मेदार नेतृत्व की भी मिसाल है।

Related Articles

Back to top button