गौतम बुद्ध नगर में मौसम के मिजाज में बदलाव है। मौसम का बदला मिजाज कुछ कहता है ?

डॉ देवेन्द्र कुमार शर्मा
Panchayat 24 : दिल्ली एनसीआर के मौसम के मिजाज के बारे में भविष्यवाणी करना जोखिम भरा है। जनवरी के महीने में मौसम मार्च के महीने जैसा अहसास करा रहा है। वैसे गौतम बुद्ध नगर जिले में भी मौसम बदला हुआ है। पुलिस लाइन में 26 जनवरी को अयोजित परंपरागत पुलिस परेड़ के दौरान खिलखिलाती धूप और सर्द हवा के बावजूद यहां बहुत कुछ सामान्य नहीं था। हाल ही में पत्रकारों की गिरफ्तारी के बाद बदले माहौल का असर पुलिस लाइन में आयोजित कार्यक्रम में पुलिस और पत्रकारों के बीच भी दिखा।
कार्यक्रम के दौरान पुलिस अधिकारी पत्रकारों से गर्मजोशी से मिल रहे थे। अति उत्साह देखकर प्रतीत हो रहा था जैसे एक नई शुरूआत करना चाह रहे हो। वहीं, पत्रकार भी पुलिस के साथ संबंधों की गर्मजोशी को बढ़ाने के साथ कार्यक्रम का लुत्फ ले रहे थे। फिर भी महौल में अति सतर्कता का भाव प्रकट हो रहा था। हर कोई पत्रकारों की गिरफ्तारी के प्रकरण पर चुप्पी ही साधे रहा। हालांकि सभी के मन में इस प्रकरण पर अंदर की बात जानने की जिज्ञासा साफ दिख रही थी। कुछ पत्रकार और पुलिस अधिकारी भीड़ से दूर गुफ्तगू करते हुए भी दिखे। कार्यक्रम में आए पत्रकार भी अपने अपने गुटों में कई तरह की चर्चा कर रहे थे।
चर्चा के केन्द्र में पत्रकारों पर पुलिस द्वारा की कार्रवाई जरूर थी। लगभग हर पत्रकार प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष पुलिस कार्रवाई को स्वीकारोक्ति प्रदान कर रहा था। कुछ पत्रकार पुलिस लाइन में आयोजित कार्यक्रम को एक अवसर के रूप में ले रहे थे। नोएडा अध्यक्ष पद से पंकज पाराशर की बर्खास्तगी के बाद पैदा हुए शुन्य को भरने के लिए संभावनाएं तलाश रहे थे। अध्यक्ष पद के लिए अपने चयन को लेकर अन्य पत्रकारों की नब्ज भी टटोल रहे थे। कुछ वरिष्ठ पत्रकार धैर्य रखने की नसीहत दे रहे थे।
जिले में पुलिस और पत्रकारों के संबंध एक संक्रमण काल से गुजर रहे हैं। पुलिस अधिकारी भी इस बदलाव पर नजर रख रहे हैं। पुलिस की ओर से संकेतों में संदेश मिल रहा है कि कार्रवाई एक अपराधिक कृत्य के खिलाफ की गई है। पुलिस-पत्रकार संबंध प्रभावित नहीं है। कुछ पत्रकार पुलिस कार्रवाई से आतंकित हैं। जबकि कुछ पत्रकार कानून का सम्मान करने और न्यायपालिका पर भरोसे की बात कहकर अपना भाव प्रकट कर रहे हैं। बहरहाल पुलिस हो या पत्रकार, पेशे की मर्यादाओं को स्वीकारना चाहिए। संबंध हो या मौसम, प्रकृति के विपरीत अप्रत्याशित बदलाव नुकसानदेह ही साबित होता है। बदलव प्रकृति का नियम भी है। ऐसे में बदलाव का स्वरूप हमें स्वयं तय करना है।