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नोएडा सेक्टर-150 की दर्दनाक घटना : विकास के दावे, मौत की हकीकत, मलाईदार और कमाईदार जिले में डूब गया सिस्टम

The tragic incident in Noida Sector-150: Claims of development, the harsh reality of death, and a system drowned in corruption in this lucrative and wealthy district.

Panchayat 24 (नोएडा) : काश, उस रात कोहरा न होता। काश, पानी इतना ठंडा न होता। काश, समय पर पर्याप्‍त रस्सी मिल जाती। काश, बेसमेंट में पानी ही भरा हुआ न होता। काश, सिस्टम थोड़ा-सा भी संवेदनशील होता। लेकिन सवाल यह नहीं है कि काश क्या-क्या नहीं हुआ, सवाल यह है कि जो होना चाहिए था, वह क्यों नहीं हुआ ?

नोएडा सेक्टर-150 में युवा सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज की मौत कोई हादसा नहीं, बल्कि एक सुनियोजित प्रशासनिक विफलता है। यह वह विफलता है, जिसमें पुलिस, प्राधिकरण, राहत एजेंसियां और पूरा सिस्टम एक साथ फेल हुआ। घंटों तक एक युवक मौत से जूझता रहा, उसकी चीखें अंधेरे, कोहरे और ठंडे पानी में घुटती रहीं, लेकिन सिस्टम संवेदनहीन बना रहा।

अब, जब एक जवान जान जा चुकी है। उसको बचाया जा सकता था, बचाया नहीं जा सका। इसलिए सिस्टम ने दूसरा रास्ता चुन लिया है—जिम्मेदारी से भागने का रास्ता। अब कहा जा रहा है कि गाड़ी तेज थी। अब फुसफुसाया जा रहा है कि शायद शराब पी गई थी।
जबकि सच्चाई यह है कि अभी तक किसी भी आधिकारिक रिपोर्ट में इसकी पुष्टि नहीं हुई है। यह वही पुराना तरीका है कि मरने वाले को ही कटघरे में खड़ा कर दो, ताकि सिस्टम के दामन पर कोई दाग न लगे।

सवाल यह भी है कि आखिर गौतम बुद्ध नगर जैसे जिले में, जिसे सरकारें विकास, निवेश और कमाई का मॉडल बताती नहीं थकतीं, वहां एक युवक को बचाने के लिए न तो पर्याप्त संसाधन थे और न ही तत्पर इच्छाशक्ति। यह वही जिला है, जहां तैनाती को ‘मलाई’ माना जाता है, जहां पोस्टिंग का मतलब सेवा नहीं, बल्कि सुविधा और कमाई होता है।

प्रेमचंद की ‘नमक का दरोगा’ आज भी प्रासंगिक है, लेकिन अफसोस यह है कि आज के मुंशीजी और उनके अनुयायी सत्ता के गलियारों में ज्यादा ताकतवर हो चुके हैं। ईमानदार अधिकारी यहां अपवाद हैं और जो अपवाद बनकर काम करना चाहता है, उसके खिलाफ अघोषित असहयोग शुरू हो जाता है। ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ का नारा यहां आदर्श नहीं, बल्कि अपराध बन गया है।

गौतम बुद्ध नगर में ट्रांसफर और पोस्टिंग का खेल किसी से छिपा नहीं है। लखनऊ की चौखटों पर हाजिरी, मंत्रियों की कृपा और सिफारिशों की सीढ़ियां—यही तय करती हैं कि कौन यहां टिकेगा और कौन बाहर जाएगा। ऐसे माहौल में यह उम्मीद करना कि सिस्टम एक आम नागरिक की जान के लिए संवेदनशील होगा, शायद सबसे बड़ी भूल है।

युवराज की मौत सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं है। यह उस सिस्टम का आईना है, जो चमकते शहरों की इमारतों के नीचे लापरवाही, लालच और अमानवीयता की गहरी नींव पर खड़ा है। एक बुजुर्ग पिता अपनी आंखों के सामने बेटे को मरता देखता रहा और सिस्टम तमाशबीन बना रहा। सवाल बहुत सीधा है— अगर इतना बड़ा जिला एक युवक की जान नहीं बचा सका, तो वह विकास किस काम का?
और अगर इस मौत के बाद भी कोई जिम्मेदार नहीं ठहराया गया, तो अगली चीख किसकी होगी ? इसके लिए इंतजार कीजिए। 

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