विपक्ष का साथ, सत्ता पक्ष का सहयोग और अधिकारियों में धमक, गौतम बुद्ध नगर में किसान नेता होने के बड़े मायने हैं !
Support of the opposition, cooperation of the ruling party and influence among the officials, being a farmer leader means a lot

Panchayat 24 : यदि सबसे सफल संगठन अथवा नेता के नाम पर विचार किया जाए तो आपके जहन में हो सकता है देश के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में भाजपा का नाम कौंध जाएं। लेकिन मैं इससे सहमत नहीं हूं। सत्ता पक्ष में होने के बाद भी सत्ताधारी दल और नेताओं को विपक्ष के चुभते सवालों और धारदार हमलों का सामना करना पड़ता है। उन्हें भी सत्ता खोने का भय जरूर सताता है। लोकतंत्र में सत्ता आनी जानी है। सवाल उठता है कि फिर कौनसा दल, संगठन अथवा नेता ऐसा है ?
दरअसल, देश की वर्तमान परिस्थितियों में किसान संगठन और किसान नेता मेरे इस सवाल का जवाब हो सकते हैं। देश में पेशे के तौर पर किसानी को लोग भले ही पसंद न करें। खेतीबाड़ी से लोगों का मोह भंग हो रहा है, लेकिन किसान नेता होने के लिए ऐसा नहीं है। देश में तेजी से बढ़ते किसान संगठन भी इस तरफ इशारा करते हैं। किसानों की लड़ाई लड़ने के नाम पर किसान नेताओं को सत्ता पक्ष की घेराबंदी के लिए विपक्षी दलों का हमेशा साथ मिलता रहता है। कहीं न कहीं सत्ता पक्ष भी पर्दे के सामने अथवा पर्दे के पीछे इन्हें सहयोग करता है। अधिकारी वर्ग में किसान नेताओं की धमक बनी रहती है। हालांकि यह चर्चा का विषय जरूर हो सकता है कि इन किसान नेताओं ने किसानों की लड़ाई को कितना अंजाम तक पहुंचाया है ? इतना जरूर तय है कि किसानों के प्रति देश की जनता के मन में सम्मान और भावनात्मक जुड़ाव का किसान नेता और किसान संगठन जमकर निजी हितों के लिए प्रयोग कर रहे हैं। यही कारण है कि किसानों की लड़ाई लड़ने के लिए खड़े हुए किसान नेता और किसान संगठनों के रातों रात दिन बदल जाते हैं, लेकिन किसान दशकों बाद भी अपनी दुर्दशा पर आंंसू ही बहा रहे हैं।
गौतम बुद्ध नगर को देश की आर्थिक राजधानी कहा जाता है। यहां स्थित नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेस-वे औद्योगिक विकास प्राधिकरण दुनिया में एक औघोगिक शहर के रूप में पहचान बना चुके हैं। यहां की सड़के, शॉपिग मॉल, और ऊंची ऊंची रिहायसी और कमर्शियल इमारतें दुनिया भर का ध्यान अपनी ओर खींचती हैं। लेकिन इस अध्याय का एक सच यह भी है कि इस विकास में उस किसान को कहीं पीछे छोड़ दिया गया है जिसने इस विकास की नींव रखी। पूरे परिवार का आधार माने जाने वाली जमीन को खुशी खुशी इस विकास के लिए सरकार को सौंप दिया। सरकार भी विकास में किसानों का उचित स्थान नहीं दे सकी हैं। इतना ही नहीं, जिले में व्याप्त भ्रष्टाचार का सबसे अधिक शिकार भी किसान ही हुए हैं। जिले में तैनात रहे अधिकांश अधिकारी वर्ग के लिए किसान दुधारू पशु से अधिक कुछ भी नहीं रहे हैं।
कहते हैं कि सहने की एक सीमा होती है। अत: एक समय के बाद यहां के किसानों का धैर्य भी जवाब दे गया। किसानों ने अपने हक की आवाज उठाई। यहां घोड़ी बछैड़ा और भट्टा पारसौल जैसे हिंसक आन्दोलन भी हुए। कई लोगों की इन आन्दोलनों में मौत हुई। इसके अतिरिक्त पिछले तीन से चार दशक से अलग अलग स्थानों पर मांगों को लेकर किसान आन्दोलन चलते आ रहे हैं। किसानों को लगातार अपनी मांगों के लिए धरने प्रदर्शनों का हिस्सा बनना पड़ रहा है। इस दौरान किसानों की दशा में बहुत अधिक बदलाव नहीं हुआ। यदि कुछ बदलाव आया है तो किसान आन्दोलनों की अगुवाई करने वाले किसान नेताओं की दशा मेंं। समय के साथ किसानों का नेतृत्व बदलता रहा, किसानों की दशा नहीं। किसानों को उनका हक दिलवाने के नाम पर आन्दोलन और धरना प्रदर्शन करने वाले किसान नेता रातों रात फर्श से अर्श तक का सफर तय करते चुके हैं।
गौतम बुद्ध नगर में पिछले ढाई दशक में कई किसान संगठन अस्तित्व में आए हैं। किसानों को एकत्रित करके शासन प्रशासन के सामने किसानों की समस्याओं को उठाया है। कुछ मांगों को मनवाने में सफलता भी पाई है। लेकिन इस दौरान किसान नेताओं की नियत पर भी सवाल उठते रहे हैं। लोगों के बीच इस बात की भी चर्चा होने लगी है कि किसानों को भीड़ के रूप में एकत्रित करके किसान नेताओं द्वारा सत्तापक्ष पर अनावश्यक दबाव बनाने अथवा ब्लैकमेल करने का प्रयास किया है। कई बार हजारों की संख्या में किसानों से एक साथ बात करने की अपेक्षा किसान नेताओं से बातचीत करना और उनकी बातों को स्वीकार करना सत्ताधारी पार्टी के लिए फायदे का सौदा होता है। कई लोग कहते हुए सुने जाते हैं कि किसान आन्दोलनों के बाद प्राधिकरणों के आला अधिकारियों के साथ किसान नेताओं की अच्छी खासी सांठगांठ हो गई है। किसान आन्दोलनों के बाद किसान नेताओं के बताएं गए कामों को प्राधिकरण के अधिकारी तवज्जो दे रहे हैं। ऐसी बातें भी सुनने में आई थी कि किसान आन्दोलन से किसान नेताओं के निजी हित जुड़े हुए हैं। कई किसान संगठनों ने जिले से होकर गुजरने वाले एक्सप्रेस-वे और हाईवे पर किसानों के लिए टोल मुक्त कराया है। वास्तवकिता इससे अलग है। वास्तव में जिन वाहनों के नाम से किसान नेताओं द्वारा हाईवे और एक्सप्रेस-वे प्रबंधन को सूचना दी जाती है, उन्हें ही टोल मुक्ति का लाभ मिलता है। इस व्यवस्था का लाभ पाने से अधिकांशत: असल किसान वंचित ही रह जाते हैं।
हालांकि अभी तक गौतम बुद्ध नगर जिले में किसान आन्दोलन किसी विचारधारा से जुड़े हुए नहीं थे। पिछले कुछ सालों में जिले में, विशेष रूप से ग्रेटर नोएडा क्षेत्र में, किसान आन्दोलनों की अगुवाई किसान सभा द्वारा की जा रही है। बता दें कि किसान सभा वामपंथी दल का किसान संगठन है। ग्रेटर नोएडा में हुए पिछले कुछ किसान आन्दोलन किसान सभा के नेतृत्व में ही किए गए हैं। किसानों के बीच किसान सभा ने तेजी से पैठ बनाई है। इसका श्रेय किसान सभा के जिलाध्यक्ष एवं प्रवक्ता रूपेश वर्मा को भी जाता है। वह एक वामपंथी विचारधारा से प्रभावित व्यक्ति है और छात्र जीवन से ही राजनीति में सक्रिय रहे हैं। किसान सभा द्वारा किसान आन्दोलनों की अगुवाई किए जाने के बाद जिले के किसान आन्दोलनों की रणनीति में भी बदलाव आया है।
गौतम बुद्ध नगर में वह सभी परिस्थितियां मौजूद हैं जो वामपंथी विचारधारा के विकास के लिए जरूरी होती है। इसके बावजूद यहां वामपथी राजनीति को कोई सफलता नहीं मिल सकी है। रूपेश वर्मा ने जिस तरह से किसान आन्दोलनों और किसानों के बीच किसान सभा की पकड़ को मजबूत किया है, इससे संकेत मिलते हैं कि किसान सभा निकट भविष्य में गौतम बुद्ध नगर में वामपंथी राजनीति के लिए जमीन तैयार कर रही है। किसान सभा धीरे धीरे अपनी सक्रियता का दायरा बढ़ा रही है। किसानों की समस्याओं के बाद औद्योगिक संस्थाओं में श्रमिकों की समस्याएं, रहड़ी पटरी वालों की समस्याओं को भी उठा रहा है। इतना ही नहीं किसान सभी भी दूसरे किसान संगठनों की तरह किसान सभा के लिए हाईवे और एक्सप्रेस-वे पर टोल माफी की मुहिम चला रही है। यदि भविष्य में किसान सभा गौतम बुद्ध नगर में वामपंथी राजनीति के लिए अवसर के द्वार खोलती है तो मूल समस्याअपनी जगह पर कायम रहेगी। अर्थात अपनी दुर्दशा पर आंसू बहाने का किसानों का अंतहीन सफर जारी है।