बरसात का मौसम और मेरी आधुनिक शहर ग्रेटर नोएडा की छोटीसी यादगार यात्रा
Rainy season and my short memorable trip to the modern city of Greater Noida

Panchayat 24 : जब हमारे प्यारे शहर ग्रेटर नोएडा की तुलना देश विदेश के अत्याधुनिक शहरों से की जाती है तो दिल खुशी से झुम उठता है। मानो बरसात में मोर नृत्य कर रहा हो। वैसे बरसात के मौसम का अलग ही आनन्द है। कुछ लोग बरसात के मौसम में लांग ड्राइव पसंद करते हैं। यदि बात ग्रेटर नोएडा शहर करें तो बात ही अलग है। मैंने भी बरसात के मौसम में ग्रेटर नोएडा की एक छोटी मगर यादगार यात्रा की है। दरअसल, मुझे सेक्टर-148 निजी काम से जाना था। वैसे तो ग्रेटर नोएडा जाने के लिए मैं अन्य मार्ग का प्रयोग करता हूं। लेकिन आज मुझे दादरी में कुछ काम था। इस बीच बारिश भी शुरू हो गई। सोचा, यहीं से होते हुए ग्रेटर नोएडा पहुंचा जाए। बस यही फैसला मेरी इस यात्रा की अहम कड़ी साबित हुई।
अपने गंतव्य पर पहुंचने के लिए मैं कार में सवार होकर दादरी रेलवे रोड़ पर पहुंच गया। वहां जाम लगा हुआ था। सोचा बारिश के कारण यातायात अवरूद्ध हो गया है। लेकिन जल्द ही मेरा यह विचार गलत साबित हुआ। दादरी नहर बाइपास से लेकर रेलवे फ्लाई ओवर तक सड़क पानी में डूबी हुई थी। वाहन चालकों को भारी समस्या का सामना करना पड़ रहा था। यह हालात फ्लाईओवर पर पहुंचते ही अधिक गंभीर हो गए थे। सड़क में बने गड्ढे चालकों की समस्या को बढ़ा रहे थे।
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तिलपता गांव में प्रवेश करने से पूर्व ही आने वाली समस्या का आभाष होने लगा था। कंटेनर डिपो से लेकर डेंसो कंपनी तक इधर उधर फंसे वाहनों के कारण लगा लंबा जाम था। सड़क पूरी तरह से पानी में डूबी हुई थी। तिलपता गांव का तालाब अपनी सीमाएं तोड़कर सड़क को पूरी तरह से डुबा रहा था। सड़क देखने में नहर प्रतीत हो रही थी। वाहन चालकों के लिए इस छोटी सी दूरी को पार करना मानो युद्ध लड़ने जैसा प्रतीत हो रहा था। कार और बडे वाहन किसी तरह लड़ाई लड़ रहे थे। सड़क पर घुटनों तक भरे पानी में दुपहिया चालक अपनी बाइक और स्कूटी को पैदल खींच रहे थे। प्रतीत हो रहा था कि पानी में डूबने के कारण उनकी बाइक एवं स्कूटी बंद हो गई थी। खैर लगभग घंटे की मशक्कत के बाद यहां से किसी तरह निकलने के बाद जान में जान आई।
परी चौक पहुंचने के लिए 130 मीटर सड़क पर मुड गया। शायद आज दुर्भाग्य साथ छोड़ने को तैयार नहीं था। यहां निर्माणाधीन फ्लाईओवर के पास भीषण जाम लगा हुआ था। वाहन चालकों ने जाम खुलने की उम्मीद छोड़ दी थी। फिर लगभग 35 मिनट बाद उम्मीद की किरण जागी और गाडियों के रैंगने का सफर शुरू हुआ। किसी तरह रैंगते हुए एक घंटे बाद अण्डरपास के पास पहुंचे। लगा कि आगे जाना असंभव है। अत: निर्माणाधीन फ्लाईओवर के नीचे से होते हुए गुलिस्तानपुर की ओर मुडना सही समझा। गुलिस्तानपुर अण्डरपास से होते हुए किसी तरह गंतव्य तक पहुंचा सका।
सोचता हूं कि जो लोग को अपनी छोटी सी यात्रा में इस तरह का संघर्ष रोजाना और सुबह एवं शाम झेलना पड़ता है, उनका क्या हाल होता होगा ? क्या यह विचार उन लोगों के जहन में भी कभी कौंधता होगा जिनके जिम्मे ग्रेटर नोएडा को समस्या मुक्त शहर बनाने की जिम्मेवारी है ? क्या सपनों का शहर कहे जाने वाले शहर ग्रेटर नोएडा के बारे में ऐसे समाचार सुनकर इनकी अंतराात्मा कोई आवाज नहीं आती ? फिर बुजुर्गों की एक कहावत याद आ गई कि ”जाके पांव न पड़ी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई।”