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नोएडा हादसा : कार्रवाई से आगे सवालों की कतार, पहला सवाल-क्या कोई बदलाव आएगा ?

डॉ देवेंद्र कुमार शर्मा

Panchayat 24 (नोएडा) : नोएडा के सेक्टर-150 में निर्माणाधीन बेसमेंट में भरे पानी में कार सहित डूबने से 27 वर्षीय इंजीनियर युवराज मेहता की मौत ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश की ‘शो विंडो’ कहे जाने वाले गौतम बुद्ध नगर की व्यवस्थाओं पर कठोर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। घटना के बाद राज्य सरकार ने नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण के सीईओ लोकेश एम को पद से हटाते हुए मेरठ जोन के एडीजी के नेतृत्व में तीन सदस्यीय विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया है।
लेकिन सवाल वही पुराना है—क्या यह कार्रवाई स्थायी सुधार की शुरुआत बनेगी या फिर समय के साथ सब कुछ पहले जैसा ही हो जाएगा? या फिर जन आक्रोश को शांत करने के लिए सरकार के पास यही एकमात्र विकल्प था ?

औद्योगिक विकास के नाम पर लगभग पूरा जिला नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना औद्योगिक विकास प्राधिकरणों के अधीन है। जिले का वर्तमान और भविष्य—दोनों का स्वरूप इन्हीं प्राधिकरणों की नीतियों से तय होता है। बीते वर्षों में जिस तरह बिल्डरों को बढ़ावा दिया गया, उसने इन संस्थाओं के ‘औद्योगिक विकास प्राधिकरण’ होने पर ही सवाल खड़े होने लगे थे । लंबित विवादों की सूची उठाइए तो उसमें बिल्डर संबंधी मामलों की भरमार मिलेगी। गौतम बुद्ध नगर पुलिस कमिश्नरेट के नोएडा और ग्रेटर नोएडा जोन का शायद ही कोई थाना ऐसा हो, जहां रोज़ बिल्डरों से जुड़े प्रकरण लेकर लोग न पहुंचते हों।

कुछ अधिकारियों के लिए यह जिला एक ऐसी दुधारू गाय की तरह है, जिसे केवल दुहने से मतलब है—उसके स्वास्थ्य से नहीं। नतीजा यह कि व्यवस्था की लापरवाही की कीमत आम लोग चुका रहे हैं। चाहे कितने ही युवराज समय से पहले काल के गाल में समा जाएं, तंत्र की संवेदनशीलता पर कोई स्थायी असर नहीं दिखता।

गौतम बुद्ध नगर में पुलिस कमिश्नरेट व्यवस्था इसी उम्मीद के साथ लागू की गई थी कि हालात सुधरेंगे। संगठित अपराध पर पुलिस का प्रदर्शन सराहनीय रहा है, इसमें दो राय नहीं। लेकिन यह मंज़िल नहीं, केवल एक पड़ाव है। एक जिले के पुलिस मुखिया ने अनौपचारिक बातचीत में चिंता जाहिर करते हुए कहा कि आने वाले समय में नोएडा और ग्रेटर नोएडा—विशेषकर ग्रेटर नोएडा वेस्ट—में पेयजल संकट, बिजली आपूर्ति, दूषित जल निकासी दस सड़कों पर  बेकाबू ट्रैफिक जैसी समस्याएं पुलिस के सामने नई और जटिल चुनौतियां खड़ी करेंगी। इसके लिए पुलिस को और अधिक पेशेवर व प्रशिक्षित होना पड़ेगा।

हालांकि गौतम बुद्ध पुलिस कमिश्नरेट ने कई बार प्रथम स्थान हासिल किया है, लेकिन युवराज मेहता की मौत पुलिस व्यवस्था के लिए भी आईना है। यह हादसा महज़ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि भविष्य की उन चुनौतियों का संकेत है, जिनके लिए अभी से गंभीर तैयारी की जरूरत है।

नोएडा और ग्रेटर नोएडा में उगती गगनचुंबी इमारतें विकास की इबारत लिखती दिखती हैं, पर इन्हें देखते हुए मन में डरावने सवाल भी उठते हैं। आपदा प्रबंधन तंत्र कितना सक्षम है? शासन, प्रशासन और पुलिस के दावे कितने ज़मीनी हैं? युवराज की मौत इन दावों की पोल खोल देती है। पुलिस, एसडीआरएफ और एनडीआरएफ की मौजूदगी में एक पिता अपने जवान बेटे को पल-पल मौत के आगोश में जाते देखता रहा—और तमाम तंत्र बेबस खड़े रहे। यह लाचारी सिर्फ एक पिता की नहीं थी, बल्कि उन संस्थाओं की भी थी, जो कर्तव्यपालन की कसौटी पर खरे उतरने में असफल रहीं। यह घटना वहां मौजूद संस्थाओं और लोगों की भीड़ की भाव शून्यता को भी दर्शाती है।

सरकारों ने गौतम बुद्ध नगर को अर्थव्यवस्था का पहिया अवश्य बनाया, लेकिन इसके सामाजिक और मानवीय पक्ष पर गंभीरता से विचार नहीं किया। लखनऊ में बैठे नीति-निर्माताओं को शायद ही यहां के आम लोगों का दर्द महसूस होता हो। उनका सरोकार अधिकतर प्राधिकरणों और राजस्व वसूली की नीतियों से ही दिखता है। यदि ऐसा न होता तो 17 जुलाई 2018 को शाहबेरी में प्राधिकरण, पुलिस और प्रशासन की मिलीभगत से खड़ी हुई भ्रष्टाचार की दो इमारतों के मलबे में दबकर नौ लोगों की मौत के बाद हालात बदलते नजर आते। लोगों को समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ता।

शाहबेरी तो महज़ एक उदाहरण है। ऐसी अनेक घटनाएं गौतम बुद्ध नगर ने देखी हैं—हर बार शोर मचता है, जांच बैठती है, कार्रवाई के दावे होते हैं और फिर धीरे-धीरे सब कुछ पुराने ढर्रे पर लौट आता है। शायद इसी अनुभव ने लोगों को यह कहने पर मजबूर कर दिया है—“कुछ दिन की बात है… फिर सब कुछ चंगा है।”

युवराज मेहता की मौत ने व्यवस्था को एक और मौका दिया है—आत्ममंथन का, सुधार का और जवाबदेही तय करने का। सवाल यह है कि क्या यह मौका भी फाइलों में दफन हो जाएगा, या सचमुच गौतम बुद्ध नगर के भविष्य को सुरक्षित बनाने की दिशा में कोई ठोस कदम उठेंगे? जवाब समय देगा, लेकिन तब तक लोगों की उम्मीदें और आशंकाएं—दोनों बराबर बनी रहेंगी।

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