द साबरमती रिपोर्ट रिव्यू : पत्रकारिता, राजनीति और साजिश के त्रिकोण के नीचे दबी सच्चाई को रूबरू कराती है फिल्म
The Sabarmati Report Review: The film exposes the truth hidden under the triangle of journalism, politics and conspiracy

Panchayat 24 : देश में समय के साथ अंधकार में गायब हो चुके अथवा गायब कर दिए गए सत्य को उजागर करने अथवा अर्द्धसत्य को पूरा अर्थ देने के उद्देश्य से कई ऐतिहासित फिल्में बनी है। हाल ही में इन फिल्मों के निर्माण की शुरूआत हुआ यह सिलसिला कश्मीर फाइल्स, केरला स्टोरी के बाद द साबरमती रिपोर्ट तह पहुंच गया है। द साबरमती रिपोर्ट साल 2002 में गोधरा कांड पर आधारित है। फिल्म में पत्रकारिता, राजनीति और साजिश के कॉकटेल के नीचे दबकर गए गोधरा कांड के दिखाय गया है। फिल्म में 27 फरवरी 2002 में गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के बोगी संख्या एस-6 में आग लगने से हुई 59 कारसेवकों की मौत के रहस्य से पर्दा उठाने का प्रयास किया गया है। यह एक क्राम थ्रिलर फिल्म है। पूरे देश में इस फिल्म को भाजपा नेता और कार्यकर्ता देख रहे हैं। शुक्रवार को ग्रेटर नोएडा में भाजपा के नेताओं और कार्यर्ताओं के साथ देखने का मौका मिला।
साबरमती का निर्देशन
द साबरमती रिपोर्ट का निर्देशन धीरज शरण ने किया है। वह एक टीवी कीाकार हैं। उन्होंने बालाजी टेलीिफल्म के चर्चित टीवी शो कुटुम्ब यश की भूमिका निभाई है। उन्हें फिल्म निर्देशन का अनुभव नहीं है। इसका पता फिल्म में कई सीन देखकर भी चलता है। इसके बावजूद उन्होंने एक अतिगंभीर और अतिसंवेदनशील विषय को शानदार तरीके से फिल्म में पिरोया है। फिल्म की निर्माता एकता कपूर है।
फिल्म में अहम भूमिका
फिल्म में को जीवंत रूप प्रदान करने में कलाकारों की बहुत बड़ी भूमिका होता है। द साबरमती रिपोर्ट में विक्रांत मैसी, राशि खन्ना और रिद्धि डोगरा अहम भूमिका में हैं। बारहवीं फेल जैसी सफल फिल्म में अपनी एक्टिंग का लोहा मनवा चुके विक्रांत मैसी ने द साबरमती रिपोर्ट में एक बार फिर अपने अभियन से दर्शकों को प्रभावित किया हे। वहीं, रिद्धि डोगरा ने भी अपनी नकारात्मक भूमिका के साथ न्याय किया है। दक्षिण फिल्मों में अपने अभियन की छाप छोड़ने वाली राशि खन्ना का काम भी अच्छा है। अपने अभियन से उन्होंने बॉलीवुड में दूसरी अभिनेत्रियों को टक्कर देने के संकेत दे दिए हैं।
द साबरमती रिपोर्ट की कहानी – पहला भाग
द साबरमती रिपोर्ट को दो समानान्तर बिन्दुओं पर समझी जा सकती है। पहली दो पत्रकारों के बीच सिद्धांतों का टकराव और दूसरी साबरमती एक्सप्रेस में 27 फरवरी 2002 में गांधरा में हुए अग्निकांड में जलकर मरे 59 कारसेवकों की मौत का सच। फिल्म में समर कुमार (विक्रांत मैसी) एक हिन्दी पत्रकार है और वह देश के एक बड़े और प्रतिष्ठित टीवी चैनल के लिए फिल्म बीट कवर करता है। यहां अंग्रेजी पत्रकारों को सम्मान मिलता है और हिन्दी पत्रकार होने के कारण समर को अपमान का सामना करना पड़ता है। चैनल में एक अंग्रेजी महिला न्यूज एंकर मनिका (रिद्धि डोगरा) का बड़ा कद और रूतबा होता है। वह खबरों से बखूबी जानती है। सत्य को झूठ और झठ को सत्य बनाने में वह माहिर होती है। एक दिन टीवी चैनल में गुजरात के गोधरा में उत्तर प्रदेश के अयोध्या से गुजरात पहुंची साबरमती एक्सप्रेस के बोगी संख्या एस-6 में आग लगने ने की खबर आती है। घटना को कवर करने के लिए टीवी चैनल मनिका को गोधरा भेजने का फैसला करता है। मनिका के साथ बतौर कैमरामेन गोधरा जाने का मौका समर कुमार को मिलता है। दोनों गोधरा पहुंचकर साबरमती एक्सप्रेस में लगी आग की घटना को कवर करते हैं। दोनों को घटना के पीछे की सच्चाई का पता चल जाता है। राजनीतिक प्रलोभन के चलते चैनल मनिका को घटना का रूख बदलने के लिए कहता है। मनिका भी इस काम को बखूबी करती है। यह बात कैमरामेन समर कुमार को नागवार गुजरती है। वह मनिका की रिपोर्टिंग को अपने कैमरे में कैद करता है। साथ ही वह घटना के सत्य से जुड़े पहलूओं को भी कवर कर लेता है। वापस लौटकर वह टीवी चैनल को अपने कैमरे में रिकार्ड की हुई रिकार्डिंग देता है। चैनल उसको आश्वासन देता है कि उसके द्वारा कैमरे में कैद की गई सच्चाई को पूरे देश को दिखाा जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं होता है। समर चैनल का विरोध करता है। अपनी फुटेज वापस मांगता है। चैनल अपने प्रभाव से उसके ऊपर चोरी का आरोप लगाकर जेल भिजवा देता है। इस घटना के बाद वह टूट जाता है। उसकी प्रेमिका भी उसका साथ छोड़ देती है और वह पत्रकारिता से दूर हो जाता है। इस दौरान उसको शराब की लत लग चुकी होती है। फिल्म के इस पहले भाग में प्रतीत होता है कि एक ईमानदार पत्रकार एजेंडाबाज पत्रकार मंडली से हार गया है।
द साबरमती रिपोर्ट – भाग-2
फिल्म के दूसरे हिस्से में अमृता गिल (राशि खन्ना) की एंट्री होती है। वह पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी करने के बाद इस प्रतिष्ठित टीवी चैनल में काम करने के लिए आती है। पत्रकारिता के जीवन से ही वह मनिका को अपना आदर्श मानती थी। अब उसको मनिका के साथ काम करने का मौका मिला तो वह काफी खुश होती है। लेकिन मनिका अपने अहंकार में उसको बहुत अधिक तवज्जो नहीं देती है। वहीं, गोधरा कांड को हुए कुछ समय बीत चुका होता है। टीवी चैनल को नानावटी आयोग की रिपोर्ट में सच्चाई सामने आने और पोल खुलने का डर सताता है। टीवी चैनल गुजरात की सत्ता पर आसीन सरकार से निजी लाभ के लिए कुछ समझौता करना चाहता है। इसी चाहत में मनिका अपने चैनल के वरिष्ठ लोगों के साथ गुजरात पहुंचकर सरकार से डील करना चाहती है। लेकिन गुजरात सरकार उन्हें निराश कर देती है। इस घटना को मनिका और उसके चैनल का वरिष्ठ स्टॉफ अपना अपमान मानते हुए गुजरात सरकार के खिलाफ एक एजेंडा चलाता है और गोधराकांड के पीडितों की दुर्दशा दिखाकर सरकार को बदनाम करने की योजना बनाते हैं। मनिका अपने चैनल की नई रिपोर्टर अमृता (राशि खन्ना) को गोधरा भेजती है, ताकि वह अपनी रिपोर्ट को पुख्ता कर सके और राज्य सरकार पर दोष मढ़ सके। अमृता को इसके लिए गोधरा पहुंचकर पीडितों से मुलाकात कर उनकी बदहाल हालात को टीवी पर दिखाना होता है। इसके लिए अमृता गिल तैयारी शुरू करती है। इस दौरान उसको चैनल के पुराने रिकार्ड से समर कुमार की वीडियो रिकार्डिंग मिलती है। उसको अभी तक गोधरा के बारे में मीडिया में दिखाई गई रिपोर्ट को लेकर विश्वास नहीं होता। वह सच्चाई जानने के लिए समर कुमार से मिलती है। समर को लेकर वह गोधरा पहुंच जाती है। समर अमृता की काफी मदद करता है। यहां दोनों मिलकर खतरों का सामना करते हुए गोधराकांड की सच्चाई का पता लगा लेते है। वापस लौटकर अमृता इस सच्चाई को टीवी चैनल पर दिखाना चाहती है लेकिन मनिका और टीवी चैनल के वरिष्ठ अधिकारी उसको रोक देते हैं। लेकिन पूरे देश में बदलाव की हवा बहती है। इसका असर देश की राजनीतिक सत्ता पर भी दिखाई देता है। मीडिया संस्थानों की आस्था में भी बदलाव दिखाई देता है। इस बीच समर कुमार और अमृता गिल एक बड़े पत्रकार बन जाते हैं। समर कुमार पूरे देश को गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस में मारे गए लोगों की सच्चाई को सामने लाता है।
फिल्म का संगीत
फिल्म में संगीत बेहद साधारण है। हालांकि फिल्म में राम राम, जय राजा राम कई बार बजता है। यह दर्शकों को काफी पसंद आया है। फिल्म देखते समय कई बार जुनून के साथ धार्मिक भाव में बहते हुए नजर आते है और जय श्रीराम के नारे लगाने लगते हैं।
दर्शकों को फिल्म देखनी चाहिए अथवा नहीं
द साबरमती रिपोर्ट फिल्म दो तरह के दर्शकों को अवश्य देखनी चाहिए। पहला, जिन्हें गोधराकांड की जानकारी नहीं है। उन्हें घटना से जुड़ी कई अहम जानकारियों से रूबरू होने का मौका मिलेगा। यूकि यह सत्य घटना पर आधारित है ऐसे में घटना से जुड़े कई अनछुए पहलूओं के बारे में भी जानकारी मिलेगी। वहीं, दसूरा, उन दर्शकों को भी यह फिल्म अवश्य देखना चाहिए जिन्हें सत्यआधारित घटनाओं पर आधारित फिल्में देखने का शौक है। हालांकि फिल्म में वहीं सबकुछ दिखाया गया है जिसके बारे में विभिन्न समाचार पत्रों एवं मीडिया चैनलों में दिखाया गया है। कुल मिलाकर द साबरमती रिपोर्ट एक गंभीर विषय पर बनी एक शानदार फिल्म बनी है। एक गंभीर विषय को शानदार तरीके से पर्दे पर उतारने का प्रयास किया गया है। परिवार सहित इस फिल्म को देखा जा सकता है।
फिल्म का सकारात्मक
फिल्म में कलाकारों ने शानदार काम किया है। विक्रांत मैसी ने जिस तरह से समर कुमार के अपने किरदार को जिया है, उससे प्रतीत होता है कि वह पहले से ही अपनी भूमिका को लेकर पूरी तरह से तैयार थे। फिल्म में कई स्थानों पर प्रभावशाली संवाद है। कई स्थानों पर शानदार डॉयलोग बोले गए हैं। इसके अतिरिक्त मीडिया के पर्दे के पीछे के स्याह सत्य को भी उजागर करने की कोशिश की है। फिल्म की विषयवस्तु की मांग के अनुसार बड़ी सफाई से सत्य को दिखाते हुए लोगों की भावनाओं का पूरा ध्यान रखा गया है। लोगों को सत्य से रूबरू कराने के लिए सरकारी फुटेज, क्लिप ओर फोटों के साथ वास्तविक दस्तावेजों का प्रयोग किया है। फिल्म के अंत में लगभग ढाई मिनट का एक वीडियो दिखाया जाता है जिसमें गोधराकांड के वास्तविक दृश्य दिखाई देते हैं। साथ ही समर कुमार हादसे का शिकार हुए 59 कारसेवकों के नाम पढ़ता है तो दर्शक स्वत: ही घटना को दिल से महसूस करने लगता है। उस समय कुछ दर्शकों भावुक भी हो जाते हैं। बहुत हद तक फिल्म गोधराकांड को लेकर वामपंथियों और गैर भाजपाईयों द्वारा तैयार किए गए भ्रामक नेरेटिव को तोड़ने में कामयाब रही है।
फिल्म का कमजोर पक्ष
द साबरमती रिपोर्ट को फिल्म में तकनीकी स्तर पर कमियां हैं। ट्रेन जलने जैसे सीन्स में वीएफएक्स टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल ठीक ढंग से हुआ, लेकिन सिनेमेटोग्राफी में मामला थोड़ा ठंडा नजर आता है। कई बार फिल्क को देखने पर लगता है कि गोधराकांड़ की अपेक्षा फिल्म की विषयवस्तु दो पत्रकारों के बीच का संघर्ष बरकर रह गया है। कुछ स्थानों पर गंभीरता के स्थान पर हल्कापन दिखाया गया है।