एक विश्वास ने दे दिया जिंदगी भर का दर्द, क्या इस दर्द का उपचार संभव है ? जानिए क्या है पूरा मामला ?
A belief gave me lifelong pain, is it possible to treat this pain? Know what the whole matter is?

Panchayat 24 : यदि किसी व्यक्ति को किसी पेशे की जानकारी नहीं है तो बेहतर यही है कि वह पेशे के विशेषज्ञ के सामने चुप रहे। उसकी सलाह माने। ऐसी स्थिति में पेशा विशेष के विशेषज्ञ की नैतिक जिम्मेवारी हो जाती है कि जो व्यक्ति उसके ऊपर पूरा विश्वास व्यक्त कर रहा है, उसके विश्वास को कायम रखे। इसके लिए अपना श्रेष्ठ प्रयास करे चाहे परिणाम कुछ भी हो। सफलता मिले या न मिले लेकिन संबंधित व्यक्ति को विश्वास होना चाहिए कि पेशे के विशेषज्ञ ने अपनी तरफ से हर संभव प्रयास किया है। नैतिकता का पैमाना भी यही है कि हर पेशेवर विशेषज्ञ अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठा रखे। यह बात चिकित्सा जैसे पेशे के बारे में कहीं अधिक सटीक बैठती है। लोग चिकित्सक को ईश्वर का दर्जा देते हैं। लेकिन भौतिकवादी दौर में शायद नैतिकता के लिए चिकित्सा सहित किसी भी पेशे में कोई विशेष स्थान शेष नहीं बचा है। यही कारण है कि चिकित्सकों की कर्तव्यनिष्ठा में पतन देखने में आ रहा है। चिकित्सा पेशे में पतन वाकई चिंता की बात है। दरअसल, बीते 24 घंंटों में ऐसी दो सूचनाएं प्राप्त हुई जो चिकित्सा जैसे पवित्र पेशे में पतन की ओर इशारा कर रही है। यह घटनाएं कई सवाल भी खड़े करती हैं।
पहली घटना बीते शनिवार की है। सादोपुर निवासी एक मित्र के परिवार की धनवन्ती देवी नामक एक महिला के देहांत की सूचना मिली। रविवार को सामाजिक दायित्व के निर्वहन के दौरान पीडित परिवार के लोगों से मिलना हुआ। धनवन्ती देवी को पथरी के उपचार के लिए ग्रेटर नोएडा वेस्ट स्थित यथार्थ अस्पताल में भर्ती कराया गया था। अस्पताल में उनका ऑपरेशन किया गया जिसके बाद उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। परिवार के लोग अस्पताल पहुंच गए।

बातचीत के दौरान परिजनों ने कुछ ऐसी आशंकाएं जाहिर की जो वाकई में चौकाने वाली थी। हाल ही में जो खबरें मीडिया में आई उसके बाद परिजनों की आशंकाओं में सत्यतता प्रतीत हो रही थी, लेकिन इस बारे में कोई पुख्ता साक्ष्य नहीं थे ऐसे में इन बातों की यहां चर्चा नहीं कर रहे हैं। हालांकि परिजनों द्वारा अपनी आशंकाओं को लेकर अस्पताल में हंगामा भी किया गया था। अस्पताल प्रबंधन को उपचार में चूक का अहसास हुआ और दबाव में मामले की जांच की बात कहकर परिजनों को शांत कर दिया। इसके बाद से ही महिला का आईसीयू में उपचार चल रहा था। परिजनों के अनुसार उपचार के लिए 70 लाख रूपये के भारी भरकम बिल का भी भुगतान किया गया। अंतत: परिणाम बेहद दुख रहा और महिला की जान नहीं बचाई जा सकी। इस प्रकरण में पूरा गांव उपचार के दौरान चिकित्सकों की लापरवाही की बात कह रहा है।
दूसरी घटना रविवार सुबह की है। मेरे फोन पर एक व्यक्ति का फोन आता है। वह अपना नाम सोनू निवासी नईबस्ती उर्फ बैरंगपुर बता रहा था। उसकी आवाज में घबराहट और गुस्सा झलक रहा था। उसने बताया कि उसकी पत्नी आठ माह की गर्भवती थी। उसका दादरी स्थित डॉ दीपक अस्पताल में उपचार चल रहा था। अस्पताल ने उसकी पत्नी को यह कहते हुए डिसचार्ज कर दिया कि वह अब स्वस्थ्य है। जबकि महिला स्वयं चिकित्सकों से कह रही थी उसका स्वास्थ्य अभी ठीक नहीं है।

घर जाने पर महिला का स्वास्थ्य अधिक खराब हो गया जिसके बाद उसको एक अन्य अस्पताल में भर्ती कराया गया। अस्पताल में महिला का अल्ट्रासाउंड कराया गया जिसके बाद पता चला कि महिला के गर्भ में दो बच्चियां पल रही थी। दोनों की मौत हो गई है। महिला की जिंदगी बचाने के लिए अस्पताल में ऑपरेशन करके दोनों मृत बच्चियों को गर्भ से बाहर निकाला। महिला के पति का आरोप है कि पूर्व के अस्पताल में उपचार के दौरान हुई लापरवाही के कारण दोनों बच्चियों की गर्भ में ही मौत हो गई है। पीडित का आरोप है कि अस्पताल ने उससे खूब रकम बनाई और जब मामला बिगड़ गया तो पीछा छुड़ाने के लिए उसकी पत्नी को डिस्चार्ज कर दिया गया। पीडित परिवार का आरोप है कि चिकित्सकों की लापरवाही के कारण दो मासूम बच्चियों की गर्भ में ही मौत हो गई। वहीं, परिवार की बहु के प्राण भी खतरे में पड़ गए थे।
दोनों प्रकरणों से पता चलता है कि चिकित्सा पेशे में भी मानवीय संवेदनाओं के लिए कोई विशेष स्थान शेष नहीं बचा है। इस पवित्र पेशे में भी व्यक्ति की जान को लाभ और हानि के पैमाने की कसौटी पर कसा जा रहा है। अधिक से अधिक लाभ कमाने की भावना घर कर चुकी है। वरना ऐसे कैसे हो सकता है कि पथरी जैसी सामान्य बीमारी के लिए मरीज को महीनों आईसीयू में भर्ती रहना पड़े। इसके बावजूद भी मरीज की जान नहीं बचाई जा सके। अस्पताल प्रबंधन द्वारा परिजनों के मन में उठ रही आशंकाओं का भी निराकरण नहीं किया गया जिससे अस्पताल प्रबंधन की नियत पर सवाल उठना लाजमी है। वहीं, यह भी कैसे हो सकता है कि एक गर्भवती महिला का किसी अस्पताल में उपचार चल रहा हो। उपचार के दौरान महिला की बिगड़ती हालत और उसके गर्भ में पल रहे मासूम जिंदगियों की हलचल के बारे में कुछ भी पता नहीं चले। दादरी के दीपक अस्पताल प्रबंधन के द्वारा जिस तरह से जबरन महिला को डिस्चार्ज करके घर भेजा गया, उससे पता चलता है कि मामला उनके हाथों से निकल चुका था। क्या अस्पताल प्रबंधन इस कदम को समय रहते नहीं उठा सकता था? शायद उस समय अस्पताल प्रबंधन और चिकित्सकों को गर्भवती महिला धनोपार्जन का माध्यम प्रतीत हो रही थी। दोनों ही प्रकरणों में अहम सवाल यह उठता है कि आखिर पीडित परिजनों के हाथ क्या लगा ? एक महिला और गर्भ में पल रही दो मासूम बच्चियों की की मौत हो गई और परिवार द्वारा खून पसीना बहाकर संघर्ष से कमाया गया रूपया पैसा भी चला गया। ऐसे में सवाल यह भी उठता है क्या पीडित परिजनों ने चिकित्सक और अस्पताल प्रबंधन पर विश्वास करके गलत किया ? यदि ऐसा है तो फिर आप ही बताएं कि पीडितों के पास कौन सा विकल्प शेष था ?