मुख्तार अंसारी के गुनाहों की कहानी : जानिए कैसे एक प्रतिष्ठित खानदान का बालक बन गया जुर्म की दुनिया का बादशाह ?
Story of Mukhtar Ansari's crimes: Know how a child from a prestigious family became the king of the world of crime?

Panchayat 24 : बांदा जेल में बंद उत्तर प्रदेश के माफिया डॉन मुख्तार अंसारी की गुरूवार शाम को दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई। जुर्म की दुनिया में मुख्तार अंसारी का नाम जितना बड़ा था, उससे कहीं अधिक मुख्तार अंसारी के परिावर की प्रतिष्ठा थी। मुख्तार अंसारी के परिवार देश के गिने चुने प्रतिष्ठित परिवारों में से एक रहा है। देश की आजादी की लड़ाई और 1947 में पाकिस्तान से युद्ध में मुख्तार अंसारी के परिवार के लोगों ने हिस्सा लिया था। राजनीति और खेल में भी उसके परिवार का नाता है। देश के दूसरे सर्वोच्च पद पर भी मुख्तार अंसारी परिवार के लोग रह चुके हैं। लेकिन मुख्तार अंसारी ने अपराध की दुनिया में कदम रखते ही पूरे परिवार के स्वर्णिम इतिहास पर काला धब्बा लगा दिया। समय ऐसा भी आया कि मुख्तार अंसारी अपराध की दुनिया का बादशाह बन गया। पूर्वांचल में उसके सामने कोई आवाज उठाने वाला नहीं था। उसके ऊपर 50 से अधिक संगीन मुकदमें दर्ज थे। इसके बावजूद कुछ लोग उसको गरीबों का रॉबिनहुड कहते थे
कौन था मुख्तार अंसारी ?
मुख्तार अंसारी का जन्म 1967 में उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में हुआ था। पिता का नाम सुबहान उल्लाह अंसारी और मां राबिया अंसारी था। उनके दादा मुख्तार अहमद अंसारी एक स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने देश की आजादी की लड़ाई में महात्मा गांधी के साथ रहे थे। वह 1926-1927 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और फिर मुस्लिम लीग अध्यक्ष भी रहे थे। उनके नाम पर दिल्ली में एक सड़क का नाम भी है। भारत के उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी मुख्तार अंसारी के चाचा लगते थे। मुख्तार अंसारी के नाना भारतीय सेना में ब्रिगेडियर थे। उनका नाम ब्रिगेडियर उस्मान था। उन्होंने 1947 में नवशेरा की लड़ाई लड़ी थी। इस लड़ाई में देश को विजय मिली थी। सरकार ने उनकी बहादुरी के लिए महावीर चक्र से सम्मानित किया था। हालांकि इस युद्ध में वह शहीद हो गए थे। इतना ही नहीं मुख्तार अंसारी का बेटा अब्बास अंसारी एक अंतर्राष्ट्रीय शूटर है। वह राष्ट्रीय चैम्पियन रह चुका है। लेकिन मुख्तार के कारनामों की सजा उसको भी भुगतनी पड़ रही है। वह मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तार किया गया था। खुद मुख्तार अंसारी क्रिकेट का एक अच्छा खिलाड़ी रहा था। वर्तमान में उसके अपराध में साथ देने के लिए उसके बेटों, पत्नी और कई करीबियों पर पुलिस ने शिकंजा करा हुआ है।
छोटी मोटी मारपीट से शुरू हुई मुख्तार की अपराध यात्रा
माफिया डॉन मुख्तार अंसारी की अपराध यात्रा छात्र जीवन में छोटी मोटी मारपीट से शुरू हुई। मारपीट तथा छोटे मोटे अपराधों से मुख्तार अंसारी मनबढ होता चला गया। मीडिया रिपोर्ट की माने तो अपराध के प्रति उसके आकर्षण ने तेजी बढ़ा। उसके अपराध की शुरूआत में सिनेमाघर के बाहर टिकट ब्लेक किए थे। अपने बड़े भाई को साईकिल स्टैण्ड का ठेका दिलवाने के लिए लोगों को धमकाने वाला मुख्तार अंसारी बाद में रेलवे स्क्रैप, कोयला, मोबाइल टावरों पर डीजल की आपूर्ति, मछली कारोबार, पुल, सड़क, नाले, नाली और सड़क बनाने के ठेके कब्जाने के लिए मैदान में उतर गया। उसके नाम का खौफ इतना अधिक था कि पूर्वांचल में बड़े बड़े प्रोजेक्टस के ठेके मुख्तार अंसारी को मिलने लगे। उसका नाम आते ही बड़ी बड़ी देशी विदेशी कंपनियां उस प्रोजेक्टस से अपना हाथ पीछे खींच लेती थी। पहली बार 1988 में उसका नाम एक हत्या के मामले में आया। मंडी परिषद के ठेकेदार सच्चिदानंद राय की हत्या के मामले में मुख्तार का नाम पहली बार सामने आया। इस के अतिरिकत त्रिभुवन सिंह के कांस्टेबल भाई राजेंद्र सिंह की हत्या बनारस में कर दी गई। इसमें भी मुख्तार अंसारी का ही नाम सामने आया। कोई सबूत नहीं होने के कारण वह बच निकला। लेकिन अपराध की दुनिया में उसका नाम चर्चा में आ गया था। पूर्वांचल के मऊ, गाजीपुर, वाराणसी और जौनपुर जिलों में उनके नाम का डंका बजने लगा था।
नब्बे के दशक में बृजेश सिंह से शुरू हुई दुश्मनी
मुख्तार अंसारी सरकारी प्रोजेक्ट के ठेके कब्जाने के साथ जमीन कब्जाने का काम भी करने लगा था। इसके लिए बाकायदा उसने अपना एक गिरोह तैयार कर लिया था। उसी समय पूर्वांचल में बृजेश सिंह भी तेजी से अपराध की दुनिया में आगे बढ़ रहा था। दोनों का एक ही क्षेत्र में सक्रिय होने के कारण आमना सामना होने लगा। इसी बात को लेकर बृजेश सिंह मुख्तार अंसारी का सबसे बड़ा दुश्मन हो गया। दोनों के गिरोह के बीच गैंगवार शुरू हो गई।
मीडिया से मिली जानकारी के अनुसार सा 1991 में चंदौली में मुख्तार पुलिस की पकड़ में आया। वह दो पुलिस वालों को गोली मारकर फरार हो गया था। उस पर 1991 में कांग्रेस नेता अवधेश राय की हत्या के भी आरोप लगा। 1996 में एएसपी उदय शंकर पर जानलेवा हमले में मुख्तार का नाम सामने आया था। 1997 में पूर्वांचल के सबसे बड़े कोयला व्यवसायी रुंगटा के अपहरण के बाद मुख्तार का नाम अपराध जगत में रातों रात बड़ा हो गया। साल 2002 में ब्रजेश सिंह ने मुख्तार अंसारी के काफिले पर हमला कराया। इसमें मुख्तार अंसारी के तीन लोग मारे गए । अक्टूबर 2005 में मऊ में हिंसा भड़की जिसके आरोप भी मुख्तार अंसारी पर ही लगे। इसी दौरान मुख्तार अंसारी ने गाजीपुर पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। साल 2010 में अंसारी पर राम सिंह मौर्य की हत्या का आरोप लगा।
अपराध से राजनीति में किया प्रवेश
मुख्तार अंसारी ने अपराध की दुनिया में बड़ा नाम बनने के बाद राजनीति में प्रवेश किया। उसने 1996 में बहुजन समाज पार्टी से चुनाव लड़ा। इसके बाद वह लगातर 2002, 2007, 2012 और 2017 में मऊ से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे। साल 2007, 2012 और 2017 का चुनाव वह देश की अलग अलग जेल में रहकर जीते। राजनीति और अपराध की दुनिया में उसके रूतबे का यह आलम था कि जेल में भी उसको लगातार राजनीतिक संरक्षण मिलता रहा। उसने राजनीति को अपने लिए ढाल बनाया। फिर राजनीति को हथियार की तरह प्रयोग किया।
कृष्णानंद राय हत्याकांड़ पड़ गया माफिया डॉन को भारी
भाजपा विधायक कृष्णानंद राय हत्याकांड़ की धमक से माफिया डॉन मुख्तार अंसारी पर भारी पड़ गई। दरअसल, गाजीपुर की मोहम्मदाबाद सीट पर मुख्तार अंसारी परिवार का सा 1985 से कब्जा था। साल 2002 में भाजपा के टिकट पर यहां से कृष्णानंद राय ने चुनाव लड़ा और यह सीट मुख्तार अंसारी परिवार से छीन ली। यहीं से कृष्णानंद राय से मुख्तार अंसारी दुश्मनी मानने लगा था। साल 2005 में कृष्णानंद राय के काफिले पर घात लगाकर हमला किया गया। हमले में एक के 47 जैसे अत्याधुनिक हथियारों से गोलियां बरयाई गई। इस हमले में कृष्णानंद राय सहित 7 लोगों की मौत हो गई। मुख्तार अंसारी पर हत्याकांड़ को अंजाम दिलवाने का आरोप लगे। कमजोर गवाही के कारण इस हत्याकांड़ का हश्र भी अन्य मामलों जैसा ही हुआ।