महाराष्ट्र सरकार गिरी तो पैदा होगा बड़ा सवाल :- किसकी होगी शिवसेना ?
If the Maharashtra government falls, a big question will arise: Who will be Shiv Sena?
Panchayat24 (डॉ देवेन्द्र कुमार शर्मा) : महाराष्ट्र में सियासी भूचाल मचा हुआ है। शिवसेना से बगावत करने वाले एकनाथ शिंदे गुट पर शिवसेना नेतृत्व की मानमुनव्वल का भी कोई असर दिखाई नहीं दे रहा है। मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने कोरोना पॉजिटव होने के कारण वर्च्युली कैबिनेट की बैठक में हिस्सा लिया। बताया जा रहा है कि इस बैठक में 8 मंत्री शामिल नहीं हुए। इसके बाद महाराष्ट्र सरकार की तस्वीर लगभग साफ होती दिखाई दे रही है। माना जा रहा है कि शाम तक उद्धव ठाकरे इस्तीफा दे सकते हैं। लेकिन उद्धव ठाकरे को इससे भी बड़ा झटका लग सकता है। उन्हें सरकार के साथ-साथ पार्टी से भी हाथ धोना पड़ सकता है।
दरअसल, शिवसेना के बगावती गुट का नेतृत्व कर रहे एकनाथ शिंदे का कहना है कि वह शिवसेना नहीं छोड़ेंगे। अर्थात वह अलग पार्टी नहीं बनाएंगे बल्कि वह बालासाहेब ठाकरे की शिवसेना पर ही अपना दावा ठोकते हुए अपने गुट को असली शिवसेना के तौर पर पेश करेंगे। यदि दोनों गुटों के बीच पार्टी के नाम और सिम्बल को लेकर विवाद होता है तो मामला चुनाव आयोग के पास जाएगा। चुनाव आयोग तय करेगा कि असली शिवसेना कौनसी है और पार्टी सिम्बल किसके पास रहेगा ?
वर्तमान में महाराष्ट्र में कुल विधायकों की संख्या 288 है। दो विधायक जेल में है जबकि एक विधायक की मौत हेा गई है। ऐसे में यह संख्या 285 रह जाती है और सदन में बहुमत के लिए 143 सदस्यों के समर्थन की आवश्यकता है। शिवसेना नेृतत्व वाली महाविकास अघाड़ी सरकार को 152 विधायकों का समर्थन प्राप्त है। इनमें शिवसेना के 55 विधायक है। बताया जा रहा है कि एकनाथ शिंदे के पास पार्टी के 40 विधायकों सहित 6 निर्दलीय विधायकों का समर्थन प्राप्त है।
इस गुट पर दलबदल कानून लागू नहीं हेागा क्यों कि इसके लिए इस बगवाती गुट को 37 विधायकों के समर्थन की आवश्यकता पड़ती। ऐसे में शिवसेना की संख्या 20 से भी कम रह जाती है। वही एकनाथ शिंदे गुट को विधानसभा में नई पार्टी के रूप में मान्यता मिल सकती है। लेकिन दलबदल कानून के अन्तर्गत सभी विधायकों को इस्तीफा देकर पुन: चुनाव लड़कर विधानसभा सदस्य बनना होगा। यदि यह गुट शिवसेना के चुनाव चिन्ह पर दावा पेशदे सकता है। जिस गुट को बहुमत का समर्थन प्राप्त है, उसे पार्टी का चिह्न दिया जाता है। 1995 में चंद्रबाबू नायडू और हाल ही में पशुपतिनाथ ऐसा कर चुके हैं। इन्हें पार्टी सिम्बल और पार्टी का नाम दिया गया था।